अलविदा २०२२
2022 को अलविदा! बनारस की उस अनजान रात में जब अचानक फोन बंद हुआ, तो लगा जैसे इस 'मुक्ति धाम' में हमेशा के लिए खो जाने का ईश्वरीय संकेत हो। पुरानी सहेली से मुलाकात, बेटे से मजेदार शर्त और जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों से भरी यह दिलचस्प डायरी आपके भी पुराने तार छेड़ देगी।
विधा -गद्य (डायरी शैली)
दिनांक -31/12/22
--- अलविदा 2022 ---
इस अलविदा से तो मैं हमेशा ही मुंह चुराती हूं । या तो मैं जुड़ती ही नहीं किसी से और यदि रिश्ता या मित्रता किसी भी रूप में जुड़ाव हुआ तो अलविदा होना पसंद नहीं है ,लेकिन यह तो बावन हफ्तों के लिए ही आया था ,अलविदा तो कहना ही पड़ेगा चाहे कितना भी दुख हो ।
इंसान की सोच पर, उम्र के पड़ाव, अलग -अलग असर डालते हैं। स्कूली दिनों में जाते हुए साल का रंज पता नहीं चलता था । आने वाले नये वर्ष की खुशी में कितना धमाल करें इस पर ध्यान रहता था ।
अब जीवन के तीसरे दौर में एक -एक दिन बेशकीमती लगता है फिर यह तो पूरे 365 दिन थे ,जो चले गए।
आवाज देने पर भी रुकेगा नहीं न जाने वाला वर्ष, न आने वाला वर्ष ।
2022 का प्रथम सप्ताह तो अनेक वचनों और संकल्पों में , उनके लेखन -प्रलेखन में ही खर्च हो गया था।
एक सप्ताह नित नया टाइमटेबल बनाने में निकल गया।
उसके बाद का समय कहां गया कुछ याद नहीं।
फिर भी कुछ बातें इस अनेक चक्षु वाले मन ने याद कर रखी हैं।
वर्षों से ढूंढ रही थी वह सहेली चमत्कार की तरह मिली । हम दोनों को एक ही दिन एक दूसरे का नंबर और पता मिला ।
सप्ताह भर तक हम रात में देर-देर तक कहते -सुनते रहे । धरती पर पानी की तरह , जीवन में दर्द का समन्दर 70 प्रतिशत होता है।
व्हाट्सएप ग्रुप्स भी बिल्कुल एक अलग नयी दुनिया है ,जैसे विश्वामित्र ने इक्ष्वाकु वंश के त्रिशंकु के लिए बनाया था एक अलग स्वर्ग लोक।
अनेक फेसबुक फ्रेंड्स बने । कुछ दिन खुश रहते फिर नाराज़ होकर चले गए। बहुत समय लगा यह समझने में कि उन लोगों ने लाइक करने को कहा था ,उपदेश देने को नहीं ।
यूट्यूब पर सद्गुरु और राम वर्मा के मोटीवेशनल वीडियो बहुत बुद्धिमत्ता पूर्ण, अनुभव व ज्ञान से भरपूर लगे ।
इस वर्ष कर्फ्यू व अन्य कहानियां, खुले आकाश के नीचे -श्रीमती नमिता सिंह , उत्तर हिमालय चरित -प्रबोधकुमार सान्याल , जंगल -अप्टन सिंक्लेयर , जीवात्मा जगत के नियम -खुर्शीद भावनगर और कुछ पुरानी किताबें फिर से पढ़ी। नोबेल पुरस्कार की चमक से प्रभावित होकर तीन किताबें मंगवा ली थीं --ग्रेबियल मार्खोज का एकांत के सौ वर्ष , पल्ले नहीं पड़ा। प्लेग और 1985तो उदासी में भरने वाली थी। जीवन में पहली बार कोई किताब अधूरी छोड़ी।
बनारस यात्रा याद रहेगी।
बनारस एक प्रकार से पहली बार गई थी, राजभाषा सम्मेलन में।
रात बारह बजे फोन बंद हो गया था। डायरी वगैरह कुछ नहीं थी साथ में।
आख़री बातचीत में आस्था ने बताया था कि अचानक होटल बदल दिया गया है ।नाम और पता अभी भेजती हूं , बस तब तक फोन खराब हो गया।
मैं सोच रही थी कितनी मजेदार हालत है ,न शहर जाना पहचाना , न कोई पहचान ,न किसी होटल का पता ।
ईश्वर मुझे एक संकेत दे रहा है मुक्ति धाम है यह , गुम सको तो गुम जाओ सारे सुख और दुख से मोक्ष मिलेगा।
न कोई यादगार कहानी लिखी न याद रखने लायक कुछ किया । छोटी छोटी बातें याद आती हैं वो भी अब नहीं घटतीं।
बेटे से कसरत पर बहस । मैं ने कहा ' प्लैंक ' तीन मिनट रह लेती हूं इस पोज में । वह बोला शर्त लगी -- जीत गईं तो सौ रुपए दूंगा , हार गईं तो दो हजार लूंगा ।
टाइम सेट कर मैंने शुरू किया ,बहुत देर महसूस हुई समय पूरा हो चुका था , मैं उठी तो वह घड़ी लेकर भाग गया , हार गईं कहता हुआ ,नीचे से आवाज आई क्या तूफान मचा रखा है। इसी वर्ष से अब वह भी नौकरी करने बाहर चला गया है।
दो दिनों से धुंधली धूप है और हवा चल रही है , यहां ठंड नहीं है । फ़र्क करना मुश्किल है यह सन्नाटा पसरा हुआ है या तेजी से बीतते हुए समय की पदचापों का शोर है।
संसार में बहुत बहुत हलचल मची हुई है। प्रकृति का क्रोध चरम पर है -सउदी अरब ज़िद्दा में बाढ़, कहीं भूकंप , इंडोनेशिया में ज्वालामुखी , अमेरिका कनाडा में बर्फबारी जैसे हिमयुग आ गया है।
इंसान नहीं सुधरा ...यह कैसी व्यवस्था है कि किसी पागल को पावर दे दो तबाही मचाने की ।
