मोहना
मशीन सी दौड़ती जिंदगी में जब मोहना पुताई वाले को बुलाती है, तो पति का दर्द छलक उठता है—'हमसे तो दिहाड़ी मज़दूर अच्छे हैं!' क्या सच में सफेदपोश नौकरीपेशा लोग सड़क किनारे बैठे मज़दूरों से भी गए-गुज़रे हैं? मिडिल-क्लास की कड़वी सच्चाई दिखाती मार्मिक कहानी—'मज़दूर'।
मज़दूर
मोहना पाँच बजे सुबह से उठकर युद्ध स्तर पर घर के काम शुरू करती है ।सात बजे से तीन बच्चों को तैय्यार करना । टिफ़िन सहित बस में बिठाना .....तब बाक़ी कामों की बारी । पति और खुद के लिए खाना बनाकर स्कूल के लिए निकलती ।
रोज़ हड़बड़ी रहती है ।पास के मोड़ पर दिहाड़ी मज़दूर हीही ठीठी करते ,गपियते , बीड़ी फूंकते , ग्राहक यानी काम मिलने का इंतेज़ार करते दिखते । जिस किसी को मज़दूर की ज़रूरत होती है , काम और पैसा ठहरा कर उन्हें ले जाता है ।
मोहना रोज़ यहीं से निकलती है ।ग्यारह बजे स्कूल पहुँच कर फिर वहाँ की चाकरी .....।
सीज़न आने पर पुताई महँगी हो जाएगी और मज़दूर ढूँढे ना मिलेंगे , यह सोचकर मोहना ने स्कूटी रोक कर मज़दूरों से बात की । छोटा सा घर है , चार लोग मिलकर दो दिन में पुताई निपटा दो ।
पाँच दिन तो हर हाल में लग जाएँगे मैडम !
मोहना को मज़दूरों के हाव देखकर और भाव सुनकर तारे नज़र आ गए ।
मुश्किल से तीन दिन की छुट्टी मिली । बाक़ी दो दिन की छुट्टी आप ले लें - मोहना ने पतिदेव से कहा ।
सुनकर वे भुनभुनाए ........मज़दूरों से गयी गुजरी हालत हमारी है । मशीन की तरह काम करते हैं हम । कनपटियों के बाल कब सफ़ेद हो गए , पता ही नहीं चला । हमसे तो मज़दूर अच्छे , जो भी कमाते हैं पूरा उपयोग करते हैं । फिर पाँव पसार के सो रहते हैं ।हम बैठकर दो निवाले चैन से खाने को तरसते हैं ।
हमारे बच्चे भी मशीन जैसे जीवन जीने को अभिशप्त हैं , आगे उन्हें भी हमारे जैसे मज़दूर बनना है । .....और पुताई के लिए पैसे कहाँ से आएँगे ?
..रोज़ सारा काम इसलिए तो खुद ही करती हूँ -मोहना ने कहा ।
मज़दूर देर से खड़ा बातें सुन रहा था , बोला , काम करवाना हो तो बाक़ी को बुलाऊँ ?
मोहना की “हूँ” सुनकर उसने अपने मुफ़्त सरकारी स्मार्ट फ़ोन पर नम्बर लगाना शुरू कर दिया .
