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Bioscope

13June2026

विद्या

साठ के दशक में पढ़ाई के लिए बावड़ी में डूबने वाली विद्या, सत्तर के दशक में दहेज की आग में जल गई। आज वह आत्मनिर्भर है, पर क्या पितृसत्ता से उसकी जंग खत्म हुई? जन्म-दर-जन्म स्त्री के अनवरत संघर्ष को बयां करती यह मार्मिक कविता पढ़ें।

By Shashi Khare1 min read

विद्या
चिड़ियों की चहक से भी पहले
किरणों की झलक से से भी पहले
जैसे चाबी भारी हो
सेल से चलने वाली घड़ी हो
ख़त्म ना होने वाले कामों के लिए ही जन्मी हो ।
साँस लेने को भी
धरणी पर पाँव धरने को भी
विद्या कभी रुकी नहीं ,
सूरज के जाने से पहले
चिड़ियों के सोने से पहले ।।
तीन साल तक होती रही फेल
तब जाकर ढूँढी
मौत की गेल ।
बहुत धीरे से हुई थी
छपाक
सरसती बावड़ी में ,
जब उसने दोनों हाथों से
कसकर दबा ली थी
कापी और किताब ......
मरने से पहले भी
अपने पल्लू ठीक से ढका था
कमर पर कसा था ।
ये सन् साठ की बात है ।
डर गयी थीं चहचहातीं चिड़ियाँ
खामोशी में डूबी रहीं
घाट की सीढ़ियाँ ।।
फिर जन्मी विद्या .......
रंग रूप लिए
सतरंगी दुनिया में
उड़ने की साध लिए ।
दादी ने रंग दिए ।
चाची ने गुलगुले ऊन से
बुन दिया संसार ।
व्यंजनों के थाल ढाँक
क्रोशिया के तागों से
रंग लगे पाँवों से
आई वह
प्रीत के संसार में
पढ़ने की कसक लिए
सत्तर के दशक में ......
लोभ की ज्वाला में
धू-धू कर जल गई
आँगन की नीम भी काली पड़ गई
चहचहातीं चिड़ियाँ फिर डर गयीं ।
फिर जन्मी विद्या ........
हौसलों का साथ लिए ।
दादी और चाची के
सारे गुन गाँठ लिए ।
ऑफ़िस भी जाती है
ठहाके लगाती है ।
पर सदियों से चला आ रहा
एक ही क़िस्सा है
बेटे को जर , ज़मीन
वंश की प्रतिष्ठा बेटी का हिस्सा है।
चहचहाती चिड़िया अब
पिंजड़े में रहती है
कलफ़ लगी मूँछों से
उसकी ठनी रहती है ।
विद्या
शांति और सहस्तित्व
प्रेम और
पतिचारा
के पंचशील सिद्धांतों को
बार बार पढ़ती है ,
सरसती बावड़ी आँसू बन झड़ती है ।