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Bioscope

13June2026

चमगादड़ की शव यात्रा

बिना बिजली की रात और 'ड्रेकुला' का खौफ! अचानक खिड़की से टकराई एक काली पोटली ने पुरानी यादों को डरावने सच में बदल दिया। फिर छोटीबाई ने कहा—"चमगादड़ की शवयात्रा निकलेगी तभी आज सूरज निकलेगा!" डर और रहस्य से बुना यह संस्मरण जरूर पढ़ें।

By Shashi Khare5 min read

चमगादड़ की शवयात्रा और सूरज का इंतजार

वैशाख में आषाढ़ जैसा मौसम बना हुआ है। दस दिनों से आँधी-पानी ने अचंभे में डाल रखा है। अभी तो मानसून बहुत दूर है। बिजली विभाग ने मानसून की तैयारी के लिए बिजली को ऑटो सिस्टम पर डाल दिया है , बिजली लगातार जाती - आती रहती है।
जैसे -जैसे उम्र के सिक्के खर्च होते जाते हैं हम उत्तरोत्तर बचपन में सिखायी गयी अच्छी -नैतिक बातों पर विचार करना शुरू कर देते हैं।
जैसे धैर्य , अपरिग्रह बहुत सादगी दिनचर्या में । किन्तु बिजली मूल आवश्यकता बन चुकी है। बिजली की ईजाद ने संसार को ईश्वरीय नहीं मानवीय सृष्टि बना दिया है।
बत्ती गुल है अब इसके बिना न कुछ पढ़ा जा सकता है और न सोना संभव है।
गर्मी के मारे नींद भी उड़ गई।
ऊब न हो और समय व्यर्थ न जाए इसके लिए मैंने पढ़ी हुई किताबों को याद कर उनकी कहानियों में रस लेना शुरु किया।उस जमाने के बेहिसाब उपन्यास पढ़े थे। देवकीनन्दन खत्री गोपाल राम गहमरी , इब्ने सफी, सुरेन्द्र मोहन पाठक, वेदप्रकाश शर्मा, गुलशन नंदा स्कूल में एकाध पीरियड में शिक्षिका आती थीं बाकी शाम तक खाली बैठो । कक्षा की लड़कियों से कह रखा था वे सब दो दो तीन तीन उपन्यास लाकर देती थीं।
घर पर चोरी से पढ़ना होता था । कोर्स की किताब का कव्हर चढ़ा कर या किताब के अंदर किताब रखकर। आज तक यह बात समझ नहीं आई कि क्यों मना किया जाता था -- फिल्में नहीं देखना ,नावेल नहीं पढ़ना । एक बात और है गौर करने लायक जब हम उपन्यास कहते हैं तो साहित्यिक उपन्यास याद आते हैं किन्तु तब ये ठेलों पर फुटपाथ पर बिकने वाले , प्रत्येक रेल यात्री के हाथों में, दिहाड़ी मजदूरों के पास भी यह जो जासूसी और सामाजिक किताबें होती थीं इन्हीं नावेल ही कहते थे बोलचाल में।‌ नावेल बोलेंगे तो प्रेमचंद के उपन्यासों का ध्यान नहीं आता है ।
शशि बहुत नावेल पढ़ती है --यह वाक्य हमेशा , शिकायत और बुरी आदत के अर्थ में कहा जाता था ।
जबकि भगवतीचरण वर्मा, वृन्दावन लाल वर्मा, इलाचंद्र जोशी, चतुरसेन, यशपाल शरतचन्द्र ,शिवानी,अझेय मोहन राकेश के उपन्यास भी पढ़ती थी तब भी यह मेरा एक दुर्गुण माना जाता था।
रशियन साहित्य और प्रेमचंद के लिए डाँट नहीं पड़ी । किन्तु उस समय के नंदा, इब्ने सफी और पाठक के उपन्यासों में भी कुछ भी वल्गर नहीं होता था जिसके लिए उनका निषेध किया जाता। संभाल कर लिखी गई संयमित ,संभ्रांत भाषा होती थी। एक भी छोटी सामान्य गाली का शब्द भी नहीं और बहुत मर्यादित प्रेम ,
यदि इश्क अपराध है तो ।
एक भी संवाद नहीं होता था जो रोमांस का अहसास करवाये।
किसलिए इन्हें इतना अछूत माना जाता था?
यह विमर्श का विषय है यह एक दौर था लेखन का ।
इन बहिष्कृत उपन्यासों में तत्कालीन समय की सामाजिक स्थिति, लोगों की आपबीती, हँसीखुशी, उनकी यथार्थ समस्याएँ, j नवीन प्रेरणा, उत्साह, कल्पना, विभिन्न विमर्श, बौद्धिक प्रकाश पाठक के लिए कुछ भी नहीं होता था।
उन उपन्यासों में केवल समय काटने के लिए हल्की-फुल्की बातें और थोड़ी बहुत उठापटक या विद्रोह प्रेम के लिए इसीलिए इन उपन्यासों को बहुत बड़ा खतरा मान लिया गया था।
19वीं सदी के मुख्य धारा के साहित्य में सभी वे बातें थीं जिन्होंने समाज के प्रत्येक वर्ग के लोगों को
पाठक बना लिया । देशभक्ति, कुरीतियों का उन्मूलन आदि।जनजाग्रति के साथ वह साहित्य मधुर , रससिक्त संगीतमय था ।
बाद के काव्य में कवियों ने सरलता -सरसता दोनों को त्यागकर शुष्क बौद्धिकता के रूप में कविता को असामान्य बिम्बों में बाँध दिया। और आगे चालीस पचास साल में साहित्य को जनवादी होने का मुखौटा पहनाकर निम्न मध्यवर्गीय व निम्न वर्गीय लोगों की दिनचर्या की भाषा के बहाने
कहाँ पटक दिया है। प्राकृतिक क्रिया -कलापों के निर्विकार दर्शन करवाना निस्संकोच बड़बड़ाते जाना नई धारा का शगल है।
अब इन्हें लज्जालु प्रेम लिजलिजा बेवकूफी भरा लगता है। गालियों की भरमार विकट अपशब्द भाषा का हिस्सा होते हैं।
रोमांस का यथार्थ रूप दिखाने के लिए नयी लेखिकाओं ने ऐसा लिखा है कि जुगुप्सा जागती है।
लेखक कहते हैं हम आम आदमी के दुःख -दर्द आम लोगों के लिए लिखते हैं ,सब कुछ बेपर्दा कर रहे हैं भ्रष्टाचार , रिश्तों में षड्यंत्र और चालाकियाँ, पैसा कमाने के लिए अनैतिक होते लोग ,यह साहित्य क्रान्ति का बिगुल बजायेगा।
इंसाफ मिलेगा।
अभी तक तो क्रांति शुरू भी नहीं हुई।
घूम-फिर कर फिर पुराने उपन्यास याद आने लगे । याद आ गया ब्राहम् स्टोकर का ड्रेकुला। सतना में राजा की एक छोटी -सी हवेली के बड़े -बड़े कमरों में भरी दोपहरी सन्नाटा पसरा था। मैं, माँ से ‌ नजर बचाकर छत पर चली गई थी ड्रेकुला पढ़ने।
बीस -पच्चीस पेज डूबकर पढ़े होंगे कि अहसास हुआ ड्रेकुला पास ही खड़ा है।
हवा थमी हुई थी फिर भी उसका काला गाउन मुझे छू गया ।
नीचे जाने का दरवाजा मीलों दूर दिखाई दिया।
चेहरे पर पसीना बहने लगा । ड्रेकुला ढिठाई से मुस्कुराते हुए पास खड़ा था ,फिर वह मेरी गर्दन पर झुका
और मैंने दौड़ लगा दी ।
नीचे आकर मांँ के पास बैठ गई । ड्रेकुला माँ से डरता था चला गया। बदले में मैंने माँ को सच बतलाया और ड्रेकुला उपन्यास पढ़ने को दिया था।
आज आधी रात वह डर क्यों याद आया।
प्रत्येक रस अपनी चरम अवस्था में ब्रह्मानंद सहोदर होता है। इसीलिए डर भी आनंद के लक्षण उपजाता है।
हाॅरर उपन्यासों और फिल्मों में अधिकाधिक भयभीत करने का यत्न किया जाता है और पाठक -दर्शक सिहरने का आनंद लेते हैं।
पहले मन सीधा -सरल था जल्दी डर जाता था।अब लोग बहुत पक्के संवेदनहीन -से हो गए हैं।हृदय में सच्चे भाव रह ही नहीं गये हैं । न प्रेम न लगाव, न दया न डर ।अब किसी लेखक के प्रयास का असर कम होता है।
जाने कब नींद लग गई थी।
भोर का पूर्वार्ध अँधेरा फैला हुआ था कि धड़ाक से कुछ खिड़की के शीशे पर टकराया।
पंखा चल रहा था, लाइट बंद थी ।खुली खिड़की से कुछ अंदर आकर तेज आवाज के साथ गिरा था।
भयावही आवाज से नींद टूटने से मैं घबराई हुई थी।
एक काले रंग की पोटली फर्श पर पड़ी हुई थी।
यह क्या है , सोच रही थी कि हवा के झौंके के साथ किसी कपड़े का स्पर्श मेरे पैरों को हुआ।
यह ड्रेकुला का गाउन था।
इतने वर्षों बाद यह क्यों आया है।
यद्यपि अब मुझे आदत हो गई है।आज हर इंसान के अंदर एक ड्रेकुला छुपा हुआ है। मित्र, रिश्तेदार, व्यापारी, प्रत्येक व्यवसाय में शिक्षा, चिकित्सा सभी में। मौका मिलते ही खून चूस लेना चाहते हैं।
बादलों ने उजाला होने नहीं दिया । बत्ती फिर गुल थी।
आक्रमणकारी बादलों के लाख प्रयत्न पर भी अंधेरा कमजोर हो गया था ।
उस धुँधले उजाले में फर्श पर काली पोटली दिखाई दी। वह चमगादड़ थी। दोनों नुकीले पैने पंजे और पैनी चोंच ऊपर उठाये हुए आसमान का मुँह नोंचने को बेताब स्वर्ण सिधार गई थी, पंखे से टकरा कर।
मतलब ड्रेकुला ही था ।
क्या मेरे अंदर का ड्रेकुला मर गया ?
छोटीबाई आयी सफाई करने तो मैं उस डरावनी चीज से नजरें बचाने वहाँ से हट गई । वह खिलखिलाते हुए बोली आ जाओ दीदी चमगादड़ की शवयात्रा में दो लोग तो हों । आओ दीदी यह शवयात्रा निकलेगी तभी आज सूरज निकलेगा।