लाहुल
बर्फ से ढकी लाहुल घाटी छह महीने तक दुनिया से कटी क्यों रहती है? एक ऐसी रहस्यमयी जगह जहाँ दुखी होकर मंत्र पढ़ने से बेहतर खुश होकर गीत गाना है! डॉ. तुलसी रमण की पुस्तक 'लाहुल' हिमालय के इसी अनछुए लोक, देव-कथाओं और प्रकृति के रोमांचक रहस्यों का अद्भुत दस्तावेज है।
हिमालय का अंतरंग लोक
आज जब , लोगों की कविता , कहानी , उपन्यास कुछ भी पढ़ने की हिम्मत नहीं पड़ती , ऐसे समय में , हिमाचल प्रदेश की लाहुल घाटी पर एक यात्रा वृत्तांत जैसी रोचक , संस्मरण जैसी विमुग्ध करने वाली , रिपोर्ताज़ जैसी आमूल -चूल जानकारी देने वाली , आदि से अंत तक बाँधकर रखने में समर्थ यह पुस्तक पढ़ना बहुत ही सुखद है।
लाहुल पुस्तक में लेखक ने हिमालय में बसी इस घाटी के अन्तरंग लोक का जो शब्द चित्र उकेरा है ,उसकी सुन्दरता तो मुखपृष्ठ से ही देखते बनती है । बस दो तीन रंगों से ही पूरा चित्र सचमुच शरद ऋतु जैसा मनोहर लग रहा है । चित्रकार चन्दन भट्टी के डिजाइन में किताब का चेहरा , किताब का कलेवर एक बेमिसाल पेंटिंग की तरह है ।
पुस्तक में चन्द्रभागा नदी स्वयं लेखक की लेखनी में स्याही का रूप धरकर लाहुल के साक्षात दर्शन करवा रही है। कभी इतिहास के मैदान से गुजरती है, कभी बौद्ध और हिन्दु परम्पराओं से , कभी वहाँ की लोककथाओं से , कभी पुरातत्व और कला सम्पदा की घाटियों में घुमाती हैं और कभी लोकमतों और किस्सों के सीप , शंख और मोती बाँटती जाती है ।
लेखक तुलसी रमण ने लाहुल के बारे में विषय-सीमाओं को इतना विस्तार दिया है कि भूगोल , इतिहास, पुरातत्व ,आर्थिक स्थिति, कृषि, कला संस्कृति ,धर्म ,भाषाएँ ,यहाँ तक कि लोक शब्दों की व्युत्पत्ति भी बतलाई है। जीवन्त व सम्प्रेषणीय चित्रण अपनी व्याख्यात्मक और सहज सरल शैली के कारण बारंबार पढ़ने को विवश करता है।
डा. तुलसी रमण हिमाचल प्रदेश के भाषा एवं संस्कृति विभाग की साहित्यिक पत्रिका 'विपाशा' के 28 वर्षों तक संपादक रहे एवं हिमाचल कला -संस्कृति-भाषा अकादमी के सचिव पद पर कार्य करते हुए अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का संपादन भी किया।
हिमाचल प्रदेश के पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में ,लाहुल एक ऐसी घाटी है जो बर्फबारी के कारण नवंबर से अप्रैल तक लगभग छह माह शेष दुनिया से कटी रहती है । यह स्पीति हिमाचल के जनजातीय क्षेत्रों की एक विलक्षण घाटी है ।
पुस्तक में ग्यारह अध्याय हैं-
भौगोलिक परिवेश, इतिहास के संदर्भ ,देशभाषा ,जाति और समाज, लोक देवता और लोक विश्वास , हिन्दु और बौद्ध परम्परा का समवाय , पुरातत्व और कला सम्पदा, लाहुल का नया चेहरा आदि ।
प्राक्कथन श्री किशोरीलाल वैद्य ने लिखा है ।
भूमिका में श्री तुलसी रमण लिखते हैं - ' 1990 में लाहुल की पहली यात्रा की तो चंद्रभागा की घाटियों में प्रकृति और संस्कृति के कई रहस्य खुलते गये । संस्कृति का निर्माण केवल मनुष्य के माध्यम से नहीं होता , बल्कि मनुष्येतर पहाड़ , बर्फ , जल , वायु , जंगल , सूर्य ,चन्द्र , वनस्पति व प्राणी जगत की इसमें विशेष भूमिका रहती है ।इन्हीं के साहचर्य में मनुष्य के भीतर की मानवीय प्रकृति स्पंदित होती है । ' बड़े जीवट वाले लाहुली लोगों ने इस कठोर भूगोल और जलवायु के साथ जीवन जीने के लिए आश्चर्यजनक संगति कायम की है।
लाहुल की एक पुरानी कहावत है- सेम दुग म-ने तोंग संग सेम यड , लू तोड ब-गा .....
अर्थात दुखी होकर ईश्वर का मंत्र पढ़ने से अच्छा है, खुश होकर गीत गाना ।
लाहुल का कोई लिखित इतिहास नहीं है। लोकवार्ता में ही कुछ तथ्य मिल पाते हैं । पहली यात्रा में ही घाटी के शीर्ष लोकदेवता --राजा गेपंग- की मिथक कथा सुनने को मिली और गेपंग के प्रति लाहुली लोगों की समग्र आस्था भी देखी
जिस समाज के पास ऐसी मिथक कथाएँ हों उसे किसी राजा के इतिहास की जरूरत नहीं। ये मिथक ही आदिम मनुष्य की भाषा और जीवन्त कौमों के दस्तावेज रहे हैं।
पुस्तक का प्रारंभ होता है भौगोलिक परिवेश के सम्यक दर्शन से। मनाली में हिड़मा देवी का मंदिर है जो महाभारत की हिडिम्बा है ।कई किस्सों की चर्चा है ।
प्रसंग वश निर्मल वर्मा की डायरी के चुनिंदा अंश हैं ।
रोहतांग में बेहद ठंडी और हिंस्र हवाएं इस दर्रे पर जान भी ले लेती हैं । रो-शव ,थड -मैदान . रोथड-रोहतांग । शव का मैदान । ईस्ट इंडिया कंपनी के समय से बाद तक आये यात्रियों के अनुभव तब और अब के विभिन्न अंतरों को स्पष्ट करते हैं।
एक लोककथा का जिक्र इस प्रकार है-ग्यलपो गेसर नामक राजा के पास उड़ने वाला घोड़ा और जादुई कोड़ा था, उसने अपना कोड़ा फटकार कर सामने की ढलान का मार्ग खोल दिया । दुबारा कोड़ा फटकारने के पहले ही देवी गुरमन ने रोक दिया - आवाजाही का मार्ग सुगम मत बनाओ ।
देखा जाये तो इन सदियों पुरानी लोककथाओं में चेतावनी के संदेश छुपे हुए हैं --प्रकृति से छेड़छाड़ सीमा में रहकर करो ।
आज उत्तराखंड के चमोली जिले में तपोवन में हुई तबाही ऐसा ही परिणाम है।
