जागरण
मोटे और सांवले शरीर से परेशान श्यामसुंदर को जब मनचाहा सुंदर रूप चुनने का जादुई मौका मिला, तो उसने कई आकर्षक चेहरे आजमाए। लेकिन क्या एक खूबसूरत चेहरा उसकी असली पहचान बन सका? आत्मा और शरीर की कशमकश को दर्शाती यह रहस्यमयी कहानी आपका दिल छू लेगी।
क्या हुआ ? इतने बुझे-बुझे थके-थके क्यों हो ? ताजे गुलाब से खिले चेहरे ने पूछा ।
कुछ नहीं , पति ने और मायूस होकर कहा ।
पत्नी ने और अधिक संबल देते स्वर में कहा--अभी बहुत घंटे बाकी हैं तुम्हारे पास आराम के लिए । लोग तुम्हें सुनने को बेताब रहते हैं । एक बार तुम्हारा वक्तव्य शुरू हो जाये तो ठसाठस भरे विशाल सभाकक्ष में भी शांति छा जाती है।
मंत्र मुग्ध होकर सुनते हैं सब । अपने ' लुक ' को लेकर कांशस क्यों रहना ? मानो मेरी बात तुम अच्छे लगते हो। आधा घंटे सो लो। जगा दूँगी । वह अँधेरा करके चली गई।
श्यामसुंदर की आँखे झपकना शुरू हुई ही थीं कि कमरे में दबे पाँव एक छाया आ गई । उसकी ऊँचाई छत तक थी , मानो मखमली अँधेरे से बनी हुई मूर्ति जिससे स्वर्णिम प्रकाश झर रहा था।
श्यामसुंदर को छाया ने उठाया और कहा चलो मेरे भंडारण में अपनी पसंद का शरीर ले लेना , अलग चेहरा , अंग-अंग अलग-अलग पसंद करना , छाया हँसी जैसे सहस्त्रों चाँदी की घँटियाँ बज उठी ।
श्यामसुंदर का इतना भारी तन चिड़िया के पंख -सा अनंत भंडारण में भाँति-भाँति के मुख वाले शरीरों के सामने उड़ रहा था।
धीर गंभीर स्वर आत्मा तक गूँजा -- इनमें से कोई भी चुन लो ।
तुम्हें उसमें भेज दिया जायेगा ।
धरती पर अपनी सदाशयता और प्रतिभा के अतिरिक्त अब तुम सुंदरता के लिए भी लोकप्रिय होगे ।
श्यामसुंदर ने धूम्रवर्णी आँखें , सुघर नाक नक्श के चेहरे के साथ कसी देह को पसंद किया और तुरंत उसमें समा गया ।
अब वह पंख सा हल्का नहीं था कि उड़ सके इसलिए उसने ऊपर आकाश की तरफ देखा -- ऐसी नीलिमा इतनी शुचिता पहले कभी नहीं देखी थी।
ईश्वरीय आभास ने उसे नये शरीर में नीचे जाने का संकेत किया ।
श्यामसुंदर ने इच्छा की स्वयं को देखने की और तुरंत अति विशाल दर्पण बन गया जिसमें उसके द्वारा पसंद किया गया शरीर तन कर खड़ा था।
-- यह मैं हूँ ?
निराशा हुई तो ईश्वरीय आभास ने सैकड़ों विख्यात चेहरे दिए- कोई भी चुन लो ।
श्यामसुंदर ने अनेक चेहरे आजमाए कहीं चैन नहीं मिला कोई अपना सा नहीं लगा ।
लाचार फिर उसी अजनबी सुंदर शरीर में घुस गया । अभी तक उसकी खोज पूरी नहीं हुई थी।
समय बीत रहा था । अब यही सही । भारी मन से वह आगे बढ़ चला । जाने से पहले एक बार पलट कर देखा उसका साँवला ,मोटा चेहरा और थुलथुल बदन झक्क सफेद कपड़ों में वहाँ पड़ा था ।
श्यामसुंदर ने उसकी तरफ झपटकर कहा - यह तो मैं हूँ , मेरी पहचान तो इसी में है, कृपया मुझे इसी में रहने दीजिए।
ठीक है कहकर उस पर जल के छींटें मारे गये।
आँखें खोलीं तो सामने हँसती हुई
पत्नी खड़ी थी -- अच्छी गहरी नींद आई न ?
एकदम तरोताजा दिख रहे हो ।
वाह क्या जागरण है।
