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Bioscope

13June2026

आत्मीय मुलाक़ातों के संग , संगमरमर पर गीतों के रंग

जबलपुर की संगमरमरी वादियों और खुले आसमान तले सजी एक जादुई काव्य गोष्ठी! जहाँ गीतों के रंग थे, प्रेम के मधुर छंद थे और जीवन की कड़वी सच्चाइयों का अक्स भी। एक ऐसी शाम जहाँ शब्द मौन हो गए और भावनाएँ गूँज उठीं। पढ़िए इस सुरीली और भावपूर्ण साहित्यिक शाम का आँखों देखा हाल।

By Shashi Khare5 min read

संगमरमरी घाटियों वाली नर्मदा के प्रिय नगर जाउलीपुत्तन(पद्म पुराण) यानी जबलपुर में
अनंततारा अपार्टमेंट में मिथलेश बड़गैयां एवं  श्री बड़गैयां जी के घर  अनौपचारिक काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ।

फ्लैट के अंदर भी बाहर जितना ही खुलापन है।
बहुत बड़ी बालकनी में नीचे बिछा कृत्रिम हरी घास का लान मुदित संतुष्ट धरती का अहसास करवा रहा था । ऊपर हथेली  पर चेहरा टिकाए चैन से पसरा नीला आसमान सभी अतिथि कवियों के गीत सुनने को अधीर दिखाई दे रहा था।
चारों ओर दूर दूर तक पहाड़ियाँ  शहर की पहुँच से घबराकर कहीं और दूर  चले जाने को
इच्छुक हैं। ऊँची- नीची चोटियाँ मानो चलते -चलते झुक कर काँटे निकाल रही हों । इतनी शुद्ध हवा,शाँति ठहराव,धूप  भी मुलायम लग रही है। खूबसूरत है मिथलेश और राजू जी का घर।

आद., श्यामसनेही लाल जी शर्मा, आद विजय बागरी जी, आद. जयप्रकाश श्रीवास्तव, आद अनिल मिश्रा जी, आद अखिलेश व आद प्रतिमा अखिलेश जी की सदाबहार जोड़ी , मिथलेश जी की दीदी व सहेली सभी ने कुन्देनदुतुषारहार धवला की भावभीनी पुष्पार्चना की । मिथलेश जी ने स्वयं रचित सरस्वती आराधना गीत के साथ गोष्ठी प्रारंभ की-
“ज्ञान का वरदान दे माँ शारदे

द्वार पर लेकर खड़ी हूँ प्रार्थना।
माँ हमें सामर्थ्य दे संकल्प की,
बुद्धि बल से  शुद्धि की उत्कर्ष की।"

वाग्देवी  को प्रसन्न कर मिथलेश जी ने एक कवि होने के गुरुतर दायित्व निर्वाह के लिए, समाज को उच्चतर शुचित अवस्था में पहुँचाने के लिए उज्जवल शब्दों को सुमधुर सधे हुए स्वर में प्रस्तुत किया , किन्तु निर्भीक और अधिकार पूर्ण  भाव में - शब्द-शब्द  कविता रसवंती ,
" कथ्य शिल्प का अनुशासन हो, उत्तम शिल्प विधान चाहिए,
हृदय शिखर को छू पाए जो , एक नवल दिनमान चाहिए।
शब्दों और स्वर के जादू से बाहर आने की इच्छा नहीं थी इसलिए पुनः आग्रह पर मिथलेश जी ने मंदोदरी के स्त्रियोचित एवं आहत भावों को व्यक्त करता एक गीत और सुनाया --
"तुम भाग्यशालिनी हो सीते,
तुमने रघुवर को पाया है

जो सिंधु पार कर लंका तक
बस तुमको पाने आया है।"

मिथलेश जी के बाद  मैंने दो कविताएँ - विद्या " एवं  "वह बच्चा " पढ़ीं ।

आद .जयप्रकाश श्रीवास्तव जी ने सभी के आग्रह पर अपने  नये -नव्य रचे गीतों का सस्वर पाठ किया । गीतों के  हृदयस्पर्शी भावों के साथ उदात्त सधी हुई स्वरलहरी जैसे मणि-कांचन योग ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।
दूसरा गीत  तो जैसे पूरी बैठक का हम सभी का आत्मकथ्य था -सच्चाई, कसैला सत्य जिसके सामने हम सब नतमस्तक हो खामोश बैठे थे। जयप्रकाश जी के स्वर और शब्द  खिड़कियों से निकलकर  दूर तिरोहित हो रहे थे--
यूँ ही गाते-गाते
चुप हो जाएँगे
भीड़ भरे इस जंगल में।

मिल जाएँगे
एक बूँद बन सागर में
गीलापन ही
बचा रहेगा गागर में

कभी-कभी बन बादल
नभ में छाएँगे
प्यास लिए वर्षा जल में।


उमर उधार मिली
चुकता कर जायेंगे
अश्रु छुपाए आँचल में।।

जयप्रकाश जी के गीत पढ़कर जितना आनंद मिलता है उनके उदात्त स्वर में उतनी ही ऊँचाई पर जाकर श्रोता डूब -डूब जाता है भावोर्मियों में।उनके दूसरे गीत ने सबको झूमने पर मजबूर कर दिया -
" अभी -अभी मौसम कुनकुना हुआ है,
पतझड़ के हाथों का झुनझुना हुआ है।
सेमल संग टेसू ने भरमाया जंगल,
महुआ के फूलों से बौराया जंगल।।

आद अनिल मिश्रा जी के हाथों में माइक था वे अपने आशु पदबंधों से संचालन वक्तृता को खूबसूरत बना रहे थे। उनसे आग्रह किया गया तो उन्होंने कुछ हाइकु सुनाए नुक्ताचीनी , एवं -

इतना तेज विकास केवल पंचायती राज में हो पाता है/
शपथ ग्रहण साइकिल पर और वापस जीप में आता है।

ज़िंदगी न कटे इतनी दुश्वार नहीं,
ज़िंदगी ज़िंदगी है कारोबार नहीं।।

दो छोटे गीत सुनाए-अकाट्य सत्य सिंधु है राम नाम का एवं  "  विचारों की आँधी/भावना जग जाती/
लोगों को जगाने,
कुछ दूर कलम भागी।
भ्रष्ट हुई व्यवस्था,
गूँजती न आह,
सुनता फिर कौन।
परिवर्तन की थाथी ले,कविता कसमसाती।
दिल की बात कह दूँ,
नींद नहीं आती।।
गीत छोटे-छोटे लेकिन सारे शब्दों को मौन कर गए। कुछ देर सभी खामोश रहे।

आद विजय बागरी जी के गीतों में मौलिक कल्पना, अमूर्त बिंबों की सहज सरल संप्रेषणीयता से सभी परिचित हैं। उन्होंने सामयिक गरम मुद्दे उठाते हुए  प्रत्येक नागरिक को गंभीर और जिम्मेदार होने
के लिए चेताया --इज्जत अभी रखी है गिरवी,धेला भरकर नहीं कमाई।

मुँहजोरों को वश में करने
पाले गुंडे  और मवाली।'

और बाकी ठीक है --यह तो चुनाव पूरा हो कर नतीजा आने के बाद की कविता है।
यह सदा सत्य रहने वाली कविता है।जब राजतंत्र था तब भी और जब प्रजातंत्र है तब भी, यह चुनाव से पहले का भी हाल है और चुनाव के बाद का भी-

"वादियाँ करतीं गुलामी,
जुर्म की ऊँची हवेली की हिफाज़त के लिए।।"

और जब काठ के उल्लू निजामी तो फिर अगले गीत में राम की प्रतीक्षा ही एक मात्र रास्ता है --

मंगल भवन अमंगल हारी।
सदियों से अभिशप्त अहल्या,
गंगा सरयू बाट निहारें/
पीड़ित मानवता के आँसू निष्ठाओं के घाट पुकारें।
देख रही है राह तुम्हारी
शबरी की कुटिया रघुनंदन।

यह राह देखना व्यवस्था से दुखी हो कर रामराज्य के लिए ही है।
इनके बाद श्री मधुकर राजू जी ने दो खूबसूरत गीत जो फिल्म के गाने हैं सुनाए। बेहतरीन सधा हुआ स्वर और अच्छी आवाज में ।

प्रतिमा अखिलेश जी ने अपने अंदाज में सधे हुए खूबसूरत स्वर में माधुर्य भावों को व्यक्त करता हुआ ---
" नूतन संवत्सर में सजना नवल , मुझे श्रंगारित कर दो "
गीत सुना कर सभी को मंत्रमुग्ध किया।
कथेतर लेखक अखिलेश जी को भी कुछ सुनाना ही पड़ेगा इस अति आग्रह पर उन्होंने दो मुक्तक सुनाए जो बहुत सरस सरल हैं एवं  जिनसे उनके कोमल संवेदनशील कवि हृदय के प्रमाण मिलते हैं --
" मचलती मछलियों को नीला समंदर दे दो,
महकती खुशबुओं को फूल का अंतर दे दो,

फ़ना होती हो कैसे तुम शमा परवाने पर,
आओ दुनिया को जरा प्यार का मंतर दे दो।।

--मुझको दौलत की ऐसी/
तू चाबी न दे,
जिसको पाने से रिश्ते बिखरने लगे,
मुझको ऐसी कभी कामयाबी न दे।।

आदरणीय श्यामसनेही लाल जी की रचनाओं का सभी लोग उत्साह व  उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे थे।
उन्होंने  अपने सद्य प्रकाशित काव्यसंग्रह -- एक पाती पिया के नाम "  के कुछ अंश सुनाए। श्रृंगार भावों के ऐसे सुंदर,वायवी प्रेमिल भावों को व्यक्त करते हुए उदात्त,नयी और अनूठी व्यंजना युक्त गीत सुनाए कि आँखों के सामने सजीव चित्र से खिंचते चले आए --
प्रकम्पित देहवल्ली/
काव्य में लय सी थिरकती है।
और छंद की गति पर ,कमर ऐसे लचकती है,
कि जैसे वय नदी में ,
भाव लहरों का हुआ संगम
मुझे ऐसा लगा/
ज्यों रूप तेरा काव्य का उद्गम।।
एक पाती मैं पिया के नाम,
लिख रही हूँ हर सुबह शाम।

तुम्हारे रूप का आलोक/
देखा है ऋचाओं में ,
मचलती  सुरभि में और
मंदगति बहती हवाओं में।

मिथलेश जी की सहेली और बड़ी दीदी ने भी गीत सुनाए।

सभी के मधुर गीतों से खिंचकर शाम तेजी से आ रही थी  , और सभी को उसका इतनी जल्दी आना अखरा।

फिर शीघ्र मिलेंगे के भावों के साथ अनौपचारिक कविगोष्ठी संपन्न हुई।
वहाँ से वापस आते हुए जयप्रकाश जी का स्वर कानों में गूंज रहा था --

गुनगुनाते हुए चुप हो जाएंगे
एक दिन शब्द यूँ ही खो जाएँगे
न धड़कन की आहट
न मीठी छुअन
इस तरह फ्रेम में बंद हो जाएँगे।।