याद बचपन की
छह वर्ष की उम्र में सड़क पर मिला एक बिना शीशे का चश्मा... क्या इसका बनारस के मंदिर में भगवान के सामने खाली हाथ खड़े होने से कोई गहरा नाता हो सकता है? माँ की वो हँसी और मन में उठी हीनभावना... पढ़िए मासूमियत और आत्ममंथन से जुड़ी यह बेहद खूबसूरत कहानी!
बहुतों को तो वह उम्र याद नहीं रहती किन्तु मैं वह उम्र भुला नहीं पाती। छह वर्ष की उम्र , रतलाम में पैलेस रोड पर रतलाम राजा के मुख्य पुरोहित का मकान , जिसमें हम किराएदार थे।
घर से महज सौ मीटर की दूरी पर मेरा प्राथमिक स्कूल था। बहुत सारी सीढ़ियाँ चौड़ी-चौड़ी , जैसे किसी मंदिर में जा रहे हों। अन्दर एक बड़ा हाल जिसमें एक तरफ काला ब्लैक बोर्ड , ठीक उसके सामने समानांतर बिछी हुईं नयी -नयी टाटपट्टियाँ । । मेरे पास तोते जैसे हरे रंग की स्लेट थी। लोहे के वर्गाकार पत्तर पर गहरा हरा रंग उस पर सफेद स्लेट बत्ती जिसे वहाँ ' पेम 'कहते थे, से लिखे अक्षर मोती से दमकते थे । वैसी सुंदर स्लेट मैंने कभी किसी और के पास नहीं देखी । शायद वह पिताजी के किसी विदेशी मित्र का उपहार रही होगी।
दो चार ही लड़कियाँ और थीं जो धीरे धीरे लिख रहीं थीं। मैंने उठकर शिक्षिका से कहा-- --मेरी स्लेट दोनों तरफ भर गई है , मैं इसे धोकर लाऊँ ? -- सुंदर तीखे नक्श वाली वो अट्ठारह-बीस वर्षीय बहनजी बोली ...हाँ हाँ जाओ , वहाँ वह बाई धो देगी , और फिर छुट्टी , वहीं से घर चली जाना , चली जाओगी न अकेली ..?
गीली स्लेट लेकर सीढ़ी उतरते समय एक गदबदा पिल्ला बहुत मासुमियत से लुढ़कते-पुढ़कते मेरे साथ हो लिया । गर्व और खुशी से मेरा सिर तन गया। वह पिल्ला वहीं कक्षा के बाहर बैठा सुन रहा था जब बहनजी मेरी प्रशंसा कर रही थीं --इतना स्वच्छ और शुद्ध लेख .., शाबाश । यहीं मेरे सामने बैठकर नहीं लिखती तो मैं कभी विश्वास नहीं करती ..कि अभी तो लिखना सीखा है और इतना अच्छा।।
सीढ़ियां उतर कर डामर सड़क के किनारे बिछी बारीक रेत पर हम दोनों जा रहे थे कि एक चश्मा-फ्रेम रास्ते में पड़ा दिखा । नया था.., पर काँच नहीं थे केवल फ्रेम । मैंने उठाया , फ्राक से पोंछ कर लगा लिया। घर जाकर अम्मा को दूँगी । अम्मा चश्मा क्यों नहीं लगातीं ....?
पिल्ला भी साथ में दाँये-बाँये हो रहा था। घर में अम्मा सामने ही थीं। मैंने उनके सामने खड़े होकर अपने चेहरे पर चश्मा संभालने की कोशिश की । सवा पाँच फुट की अम्मा और दो फुट की मैं , चेहरा ऊपर उठाकर आँखें फाड़-फाड़ कर माँ को देख रही थी । मैंने कहा --' अम्मा यह तुम्हारे लिए है ।' माँ हँसी से लोटपोट हो गई। उनकी हँसी संभल नहीं रही थी। अपने भाव आज भी याद हैं । मुझे बुरा लगा था । कई विचार मन में आये थे -स्कूल जाती हूँ अकेली , कितना सबक याद है --' आजा आ राजा , मामा ला बाजा , कर मामा ढमढम, नाच राजा छमछम ....माँ तो स्कूल जाती नहीं , मैं सुंदर अक्षर लिख लेती हूँ ।। इतना सुंदर चश्मा उनके लिए लाई हूँ और ये हँस रही हैं मेरे ऊपर ..। •
आखिर मैंने नाराजगी से पूछा , अम्मा तुम क्यों हँसी ? माँ ने कहा क्योंकि इस बिना शीशे के फ्रेम से तुम्हारी आँखें गोल-गोल दिखती हैं। तुम्हारे मुँह से बड़ा चश्मा .. अम्मा ठठाकर हँसी । मरते दम तक मुझे अपना यही अक्स याद रहेगा -खाली फ्रेम चेहरे पर , आँखों में अचंभा ...सामने हँसती हुई माँ ।
कई साल पहले पूरे परिवार के साथ बनारस घूमने गई थी। रास्ते में गाड़ी खराब हो जाने के कारण हम सब भूखे रह गये थे । पति और देवर ने कहा यदि भोजन के चक्कर में रुके तो वहाँ का प्रसिद्ध हनुमान मंदिर बंद हो जायेगा। इस विचार से हम सब सुबह के नहाये हुए किन्तु लंबे रास्ते के थके , मुचड़े हुए जैसे-तैसे दर्शन करने की लाइन में खड़े हो गये । वहाँ लाइन में लगे लोगों के हाथों में प्रसाद , चढ़ावा आदि कुछ न कुछ था सभी के पास।
ठीक मेरे आगे एक गुजराती पति-पत्नी बड़े थाल में सोने का मुकुट , चाँदी का छत्र , रेशमी वस्त्र , मिठाइयों और फलों के टोकरे लेकर दर्शन के लिए खड़े थे ।मेरे मन में हीनभावना जाग गई । मैं एकदम खाली हाथ एक फूल तक नहीं । पीछे देखा मेरे देवर नारियल चिरौंजी और देवरानी गेंदे के फूल लिए खड़ी थी । मुझे और शर्म आई इतना बड़ा परिवार और कोई चढ़ावा नहीं लाया। ऐसा लगने लगा कि वह गुजराती स्त्री मेरे खाली हाथ देख रही है।
मुझे अचानक वह बचपन का दृश्य याद आ गया । आज भी वही भाव हैं मन में भगवान के सामने , मैं समर्थ हूँ कुछ देने में , मैं आपके लिए उपहार लाई हूँ , प्रसाद लायी हूँ , मैं दे रही हूँ , मैं ज्ञानी जानती हूँ देना चाहिए , मैं दाता ..हूँ .।
लाइन से थोड़ा बाहर झांककर देवता की ओर देखा तो वो ठहाका लगाकर हँसे जैसे अम्मा हँसी थी मेरे बचपन में।।
