स्मृतियाँ झाबुआ की
बचपन की निश्छल यादों, भील संस्कृति के सौंदर्य और अधूरी प्रेम कहानियों में सिमटा एक शहर—झाबुआ। लेकिन क्या सालों बाद भी वहाँ सब वैसा ही होगा? स्नेहलता के आंसू और खाटवे का वह टंगा रह गया झोला आज किस राज को छुपाए हैं? जानने के लिए पढ़िए यादों और रहस्यों से बुनी यह खूबसूरत कहानी।
जब पहली बार झाबुआ का नाम सुना तो मैंने सोचा छह - सात साल का आदिवासी लड़का होगा । माँ ने बताया मध्यप्रदेश में अलीराजपुर, राजस्थान के बाँसवाडा और गुजरात के दाहोद जिले के बीच में एक छोटा सा बच्चे जैसा जिला है झाबुआ । वहाँ के शासकीय कॉलेज में पिताजी का स्थानांतरण हो गया है तो अब हम वहाँ रहेंगे ।
वर्षों बाद एक पत्रिका में झाबुआ के कुछ चित्र देखे तो कुछ भी पहचान में नहीं आया और मन बहुत विकल हो गया तुरंत वहाँ जाने के लिए।
शायद अभी तक सब कुछ वैसा ही होगा जैसा हम छोड़ आये थे।
सड़क से बहुत ऊँचे बने मकान, वे ओटले जिन पर हम परी -पत्थर और नदी-पहाड़ खेला करते थे ।
जीवन यात्रा का सबसे निश्च्छल, कोमल ,भोला पड़ाव अर्थात बचपन जिया है मैंने झाबुआ में इसीलिए वह मेरे अंतर्मन में बसा है।
जिस दिन झाबुआ छोड़कर बाहर निकली उस दिन के बाद से फिर कभी लौटना नहीं हो पाया ।
कितनी तेज रफ्तार से भागती है जिंदगी की रेल , न किसी स्टेशन पर अधिक ठहरती है न पीछे मुड़ती है ।
प्रत्येक स्टेशन से यादों की एक गठरी और कुछ ' पते ' इकट्ठे होते जाते हैं किन्तु झाबुआ की केवल स्मृतियाँ हैं कोई 'पता 'नहीं है मेरे पास । वहाँ से विदा लेते समय बहुत दुखी थी सोचकर कि अब कैसे कभी इन सब से मिलना होगा। पैंसठ -छयासठ सन् में बच्चे बहुत भोले और बुद्धू होते थे । उनकी माँ ,आई-बाई या ' जी ' भी भोली और बुद्धू होतीं थीं।उनके पिता बापू सा बच्चों से बेगाने सिर्फ 'गादी' के हुआ करते थे।
तो उस समय मेरी गुइंया अपना पता ही नहीं जानतीं थीं। जब वहाँ से आते समय चिट्ठी भेजने के लिए उनके पते माँगे तो सबने कहा --नहीं पता ..।
दो लड़कियाँ बड़ी चंट थीं सरोज और गुणवंती जैन ,उन दोनों ने कहा --फिकर मती कर , देख पेला म्हारो नाम लिखजे, पछे झाबुआ लिखजे , बस चीठी पोंच जावेगी।
राधाकृष्ण मार्ग पर सेठ उदयमल का वह मकान जिसके झरोखे उदयपुर की हवेलियों जैसे खूबसूरत थे , शायद अभी तक उतना ही सुंदर होगा , अम्मा ने बताया था तेइस रुपये किराया देते हैं हम इसका।
उस मकान के सामने से गुजरने वाली साफ- सुथरी डामर रोड जब बाएँ मुड़ती थी तो जरा फासले पर प्रायमरी स्कूल था।
वहाँ पढ़ने वाली छात्राएँ जब जिले में प्रथम आतीं थीं तो शिक्षिकाएँ और प्राचार्या छाती से लगाकर ऐसे माथा चूमतीं थीं मानो वे उनकी अपनी जाई हो । क्या अब भी वहाँ ऐसा होता है ।
स्कूल से और आगे जाने पर एक सूना अनंत सा दिखने वाला मैदान था । उसके ऊपर आसमान में एक सफेद बहुत सफेद ,घना गद्दर नरम मुलायम बादल तरह-तरह के आकार बनाया करता था। बादलों के ऐसे मस्तमौला ऊँट बस वहीं देखे थे । वह धीरे-धीरे हवा की जुगाली करता आगे बढ़ता , मैं पीछे -पीछे चलती हुई थक हार कर घर लौट आती थी । सोचती थी कभी न कभी तो छू लूँगी ।
उसी मैदान में इमली का एक पेड़ राहगीरों को राह बताया करता था -मेघनगर से आने और जाने वाली बसें यहाँ से मिलेंगी। उस पेड़ के नीचे यात्री अपना सामान रख दिया करते थे ।
मोहनलाल खाटवे ने भी अपना झोला उस पेड़ पर टाँगा था।उस झोले में एक और झोला था सेठ उदयमल की बेटी पद्मावती के थोड़े से कपड़ों का ,जरीगोटा लगी चुनरी का । पद्मावती के बापूसा को यह शिक्षक मोहनलाल खाटवे जरा भी पसंद नहीं था।
मोहनलाल कविताएँ और नाटक लिखते थे , मंचन भी करते थे। वह सांवले , हीरो जैसे हँसमुख युवक थे । एक बार उन्होंने किसी समारोह में नृत्य नाटिका प्रस्तुत की थी जिसमें पद्मावती राधा बन कर अत्यंत सुंदर लग रही थी । मुझे एक छोटी गोपी का रोल करने का मौका मिला था। पूरे झाबुआ में इस नाटक की बड़ी चर्चा थी ।
पिताजी को झाबुआ बाहरी दुनिया से कटा हुआ अलग -थलग लगता था । इस पर मोहन खाटवे कहते थे --सर , ये चाहे पाताल में ही क्यों न बसा हो
यहाँ का जीवन बहुत सुंदर है । मैं तो मर कर भी झाबुआ नहीं छोड़ सकता ।
उस दिन भी मेघनगर जाने वाली बस समय पर आई और चली भी गई। खाटवे का झोला वहीं टंगा रह गया । महिनों बीत गए ।। उनमें गौरैया के नहाने लायक पानी होता था ।
नहाने के लिए जान न खाने वाले माँ-बाप और घरों में पानी की छोटी टंकियों में बड़े मोटे ताले मैंने वहीं देखे थे ।
राधाकृष्ण मार्ग से दाहिनी ओर पीली कोठी के सामने से गुजर कर स्कूल जाने में अक्सर देर हो जाती थी क्योंकि चौराहे पर भील -भीलनियाँ नाचते हुए मिल जाते थे ।वे एक बड़ा सा वृत्त बना
कर गाते -बजाते कदम ताल मिलाते हुए अपनी दुनिया में झूमते हुए परम आनंदित दिखाई देते थे। उनके सिरों पर बँधी सफेद पाग से बाहर झूलते काले घुंघराले बाल, लाल पीले नीले धागों के झब्बे भी मादल की लय पर झूलते थे ।
भील लड़कियों के वक्ष पर चमचमाती काँचली ,खुली स्वस्थ चिकनी साँवली पीठ , सूती रंगीन गोट लगे ऊँचे -ऊँचे घाघरे और पिंडलियों पर कसे हुए गिलट के टोड़ल बड़े आकर्षक लगते थे ।तीखे नयन नक्श नीले बिन्दुओं के गोदना और कसी संतुलित देह
इनसे तो अप्सराओं को भी ईर्ष्या होती होगी ।
उन्हें देखकर बरबस , स्कूल जाते हुए मेरे पाँव वहीं ठिठक जाते थे।
उतनी कम उम्र में भी मेरे मन में विचार आता था कि व्यर्थ की लादी हुई व्यस्तता से इन्हें काम नहीं है । इन्हें घर में कोई काम नहीं है झाड़ू पोंछा, बर्तन, कपड़ों की धुलाई, खाना बनाना जैसे बकवास काम इनका बोझ नहीं है। पोशाक और गहने बुलाया जाता है।
गहरे कत्थई और काले रंगों में उभरा सौंदर्य , नरम लचीली डाल की तरह कमनीय देहयष्टि जो स्वर के उठाव चढ़ाव के साथ उठती गिरती थी , बालों को बिखेरने की अदा और झूठ मूठ समेटना ,उनकी इस अदा पर तो मर चुका इंसान भी जी कर बार -बार मर जाता होगा।
स्नेहलता मेरी सहेली , दृष्टि भी फिसलती जाती थी ऐसा चिकना अंडाकार चेहरा, लम्बी लम्बी आँखेंऔर फूले हुए से गुलाबी होंठ साथ ही बहुत अधिक घने लंबे बालों वाली , अम्मा रात में जो सुनाती थी पंचफूला राजकुमारी की कहानी शायद वही सामने आ गई थी ।
मैं मन ही मन सोचती थी यह इतनी डरी सहमी उदास क्यों रहती है । स्कूल में एक दिन मध्याह्न अवकाश में वह मेरे कंधे पर हाथ रखकर बाहर गेट तक गई । वह निशब्द रो रही थी इस तरह मैंने केवल बड़ों को रोते देखा था ।आँसू उसके स्कर्ट पर गिर रहे थे । किसी तरह बोली अब कभी नहीं आऊँगी ।
मेरे बापू मुझे हास्टल भेज रहे हैं।बनारस ।
अच्छा मैं खुशी से बोली वाह वहां तो बच्चे बहुत मजे में रहते हैं । अपने पिताजी की डाँट से दूर ।
यहाँ भी ईसाई फादर का हास्टल है वे तो लड़कियों के नाम भी बदल देते हैं और बड़े सुंदर इंग्लिश नाम रख देते हैं जैसे--मरियम, मेरी और वे अपनी क्लास में सूसन और एलिस हैं न ।
--मेरा बापू मुझे पढ़ाई करने से रोकता है । बायस्कोप पेटी लेकर गाँव गाँव जाता है लगता है मुझे कहीं से उठा लाया है ।
तभी खिचड़ी बालों वाले एक बहुत गंदे आदमी ने चिल्लाते हुए पत्थर फेंकना शुरू कर दिया।
स्नेहलता डर गयीऔर यहाँ-वहाँ भागने लगी । एक गिट्टी उसके माथे पर लगी खून बहने लगा ।
आज भी सड़क किनारे वह खून लगी गिट्टी पड़ी होगी । कोई बारिश उस खून को धो नहीं सकती।
और वे पेड़ बेर के, स्कूल से लौटती लड़कियाँ पेड़ो को घेर कर बेर तोड़ती थीं।
खट्टे-मीठे स्वादिष्ट बेर । वे वृक्ष तो वहीं होंगे सड़क किनारे पंक्तिबद्ध। यदि हम सुन सकें तो उनके पास हजारों बातें होंगी सुनाने के लिए।
कितनी पीढ़ियाँ आईं और चली गई।
क्या काले डामर की धुली साफ सड़कों पर खड़िया से लाइनें खींचकर लड़कियांँ अब भी चींटी धप्प खेलती होंगी । या अन्य शहरों की तरह वहाँ भी कचरा फैलने लगा है।
अब भी वहाँ रात में प्रत्येक आंगन में चाँद झाँकता होगा कि किसका माँडना सबसे सुंदर है।
क्या अब भी गोटे सजे पीले लहंगे लुगड़े पहने औरतें सुबह सवेरे जिनालय धोग देने जाती होंगी ।
बेटी वाले घरों में आँगन की किसी दीवार पर गोबर से बनी , लाल पीली चमकीली पन्नियों से सजी-धजी "संजाबाई" सन्ध्या आरती करवा कर भोग खा पीकर सो जाती होगी।
क्या स्नेहलता के लंबे सुनहरे बालों को थाम कर कोई राजकुमार आया होगा उसे राक्षस से बचा कर ले आया होगा ?
क्या यह छोटा सा जीवन सुख दुख साझा कर एक साथ बिताने की चाह रखनेवाले प्रेमियों को आज भी मौत मिलती है खाटवे की तरह ।
अब कैसा होगा झाबुआ ।
