राई . . लोकनृत्य
अठारहवें जन्मदिन पर गाँव की अपनी पहली यात्रा में, मुझे लोक कलाओं के रंग देखने को मिले। लेकिन राई नृत्य के बीच मिली पूनम की दुखद कहानी ने मेरे मन पर गहरा असर किया। एक भागने की कोशिश, एक दर्दनाक अंत। जानिए कैसे एक लोक कला मेरे लिए हमेशा के लिए त्रासदी बन गई।
अट्ठारहवें जन्म दिन पर बड़े भैया ने कहा कुछ पढ़ा -लिखा-सीखा ..कि बस अट्ठारह साल आग लगा दिए?
मैं भी ऐसा ही कुछ सोच रही थी।
पिताजी मुझे विभिन्न विषय दिया करते थे , निबंध, लेख समीक्षा आदि लिखने को।
उन्होंने कहा चलो इस बार गाँव का जीवन ठीक से देखना और रिपोर्ट लिखना सीखना। चार दिन बाद गाँव चरगँवा जाने की तैयारी होने लगी।
आज की सुविधा जनक यात्रा देखकर लगता है पहले कितना कष्ट था । पहले रेल से सागर जाओ , फिर अगले दिन बस से तहसील तक वहां से चार किलोमीटर पैदल जलती हुई धूसर धूल वाली पगडंडी पर।
न ऐसे चक्के वाले सूटकेस थे, न गॉगल्स , न छाता लादने की सूझती थी।
अच्छी वजनदार लोहे की पेटियाँ और होलडाल लेकर चलना पड़ता था।
रोडवेज की बस जिस इकलौती चाय की दुकान के पास, हम लोगों को उतार कर जाती थी वहीं सामान रखकर हम लोग पैदल जाते थे ।सामान बाद में बैलगाड़ी भेज कर मँगवाया जाता था।
आधे एकड़ में बना हुआ बहुत बड़े-बड़े कमरों ,दालान आंगन वाला घर कड़ी धूप से पहुँचने के बाद और भी शीतल लगता था ।
मकान के पीछे बाड़े में बीसियों वृक्ष अर्द्ध वृत्ताकार रूप में इस तरह खड़े थे मानो आदिवासी लोग नृत्य करमा करते हुए एक दूसरे की कमर में हाथ डाले झूम रहे हों।
वहाँ पहुँचने पर घर में उत्सव जैसा महसूस होता था।
चचेरी बहनें उत्साह से जैसे साल भर का ब्यौरा तुरंत बता देना चाहती थीं।
कोई आम के पाल दिखाना चाहती तो कोई बाड़े में लहलहाती हरे पालक , छोटे लाल टमाटरों और बैंगनी भटों की बहार।
"जे सब फालतू बातें छोड़ो "
महेश बीच में बोला था --
एक हफ्ता के लाने मंडली आई है, बहुत बढ़िया पिरोगराम है ।
राई होगी, गम्मत होगी, आल्हा भी ।दिन में सतनारायण की कथा।"
पिताजी भी उल्लास से बोले अपनी कापी तैयार रखो , अच्छा अवसर है ।जो जानकारी मिलेगी वह सब नोट करना। यह तुम्हारे जीवन की पहला रिपोर्ताज बनेगा ।
अगले दिन भोर पाँच बजे से भाग-दौड़ मची । कुटवारन ने आकर पूरा घर लीपा-पोता।
दस बजे से कथा शुरू हो गई थी।
गाँवों में दूर-दूर बसे बारह पन्द्रह घर थे । सब गाँव वाले आ गए थे।
जीवन में अनगिनत बार कथा का आयोजन देखा है किन्तु गाँव की वह सादगी , कोई बनावट नहीं न चाँदी के बर्तन में पंचामृत प्रसाद न रेशमी जरी वस्त्र, न फूल मालाएँ ।केले के पत्तों और गेंदी के फूल ही भगवान को प्रसन्न कर रहे थे।
साँझ हुई , बिजली की रोशनी नहीं थी किन्तु क्या जाने क्यों पूरा खुला आकाश उजाला सा फैलाए रहता था ।
पास ही छोटी सी मढ़िया और उसके पास चबूतरा जिस पर बैठ कर कलाकार गाते बजाते थे।
सबने आना शुरू कर दिया था। दो तीन खटिया डली थीं जिन पर बुजुर्ग लोग व सरपंच बैठे थे। लेकिन फिल्मों में जैसे दिखाए जाते हैं , सफेद धोती बंडी कमीज में मुच्छड़, चश्मुट खड़ूस टाइप के जमींदार, चौधरी, लठैत वैसा कोई नहीं ।
न उतनी भीड़।
फिल्मों में जो दिखाया जाता है और लेखक जो लिखते हैं उसकी तुलना वास्तविक जीवन से करती चलती हूँ , यह आदत आज भी है।
कवियों की हरी-भरी मखमली वसुंधरा, किसी धूम्र पहाड़ी के श्यामल पगतल के पास दर्पण सा सरोवर, सफेद बगुलों की पाँत ... कुछ भी नहीं था गाँवों में।
गाँव को घेर कर आगे बह गई नदी सुस्त, पीली, गहरी हरी पीली जलराशि विकर्षण पैदा करती थी।
नदी नहीं नरवा थी , अब वह भी विलुप्त हो गई है।
पेट्रोमेक्स , गैस बत्ती जला दी गई थीं । सबसे पहले दो भजन गणेश और शंकर जी के गाये गए फिर बजरंग बली और ग्राम देवता की अभ्यर्थना की गई फिर आल्हा गायन का जोश और स्वर ऊँचाइयों पर पहुंचा।
आल्हा गायन में तो ऐसी आग है कि बीमार पड़ा इंसान भी उछल कर खड़ा हो काल्पनिक तलवार भांजने लगे --एक को मारे दस मर जाएँ।
सब जोर -जोर से ताल ठोक रहे थे । एकाध घंटे के बाद शाँति छा गई। गायन संपूर्ण हो गया था।
जैसे युद्ध में भाग लेकर सभी थक गए हों इस तरह सबने पाँव पसारे, अँगड़ाई ली, बीड़ी सुलगाई , बूढ़े बब्बाओं ने हुक्का फूँका।
हमारे घर के सामने वाले कोठा (कमरा बड़ा) में औरतें और लड़कियाँ बैठी थीं, जरा आड़ करके।
मंदिर के पीछे से बहुत पतली पगडंडी है वहाँ से लालटेन लेकर कुछ लोग आते दिखे। तीन औरतें बड़ा घूँघट पेट तक , घेरदार लहँगा, काला ,नीला, लाल जिसमें जरी खूब चमचमा रही थी।उनके पीछे चार पाँच आदमी थे। ये बेड़नी समुदाय के लोकनृत्य राई करने वालों का दल था।
राई नृत्य बुंदेलखंड का बहुत प्रसिद्ध और बुंदेलखंड का परिचय नृत्य माना जाता है। तीन -चार औरतों और तीन -चार पुरुषों का दल कहीं भी बुलाने पर जाकर तीन -चार दिन डेरा डाले रहते हैं और रात में राई नृत्य करते हैं। पुरुष ढोलक , बांसुरी बजा कर साथ देते हैं। औरतें लगातार गोल-गोल फिरकनी की तरह घूमतीं रहती हैं । शायद यही हैरान करने वाला होता है आधा घंटे से भी अधिक समय फिरकी लेते रहना , उसके बाद दो चार गुलाटी खाना बस मुझे तो इतना ही समझ आया।
आश्चर्य होता था इस बात पर कि घूँघट हमेशा रहता था , लगभग पेट तक । शरीर का प्रदर्शन नहीं किया जाता था। घूँघट में ही घंटों नाचती रहती थीं । यद्यपि मुझे इसमें नृत्य की कला और सौंदर्य दिखाई नहीं दिया ।
इतनी देर में आसपास के गाँवों के लोग भी आ गए थे ,थोड़े दर्शक दिखने लगे थे।
हमारे सागर जिले के तहसील और उनके अंतर्गत ग्राम सचमुच बहुत छोटे थे ।एक गाँव में बीस घर भी नहीं ।
हमारे घर को मिला कर पाँच -सात कच्चे मकान थे फिर बहुत दूर -दूर खेतों पर बने एक एक मकान थे ।
अब ढोलक मंजीरे बजने शुरू हुए माहौल बना और औरतों ने गोल गोल चकरी सा घूमना शुरू किया। देर तक बस ऐसे ही चक्कर काटती रहीं।
उनके गीत तो मुझे समझ नहीं आ रहे थे सुना था बहुत रंगीन मिजाज के गीत गाये जाते हैं।
तीन में से एक जो छोटी थी, लड़की नाचते-नाचते गिर पड़ी।
लगातार फिरकी लेने से चक्कर तो आते होंगे।
बड़ी महिला ने कहा ये बीमार है जरा लिटाने को जगह दे दो।
उसे हमारे घर के पीछे वाले खाली कोठा में आराम करने भेज दिया गया।
नजर बचाकर मैं अपनी चचेरी बहन को लेकर वहाँ पहुँच गई।
लड़की ने घूँघट हटा लिया था और लेटी हुई थी।
हम दोनों को देख कर सकपका कर उठ गई।
गँदुम रंग पर भरे भरे गुलाबी होंठ और बिल्लौरी आँखें, इतना सुंदर चेहरा देखकर दिल खुश हो गया।
पुराने काव्यों में पद्मिनी नायिका की सुग्गे जैसी सुंदर नाक के बारे में पढ़ा था , आज देख भी ली।
बहुत सुंदर थी मगर बहुत उदास।
नाम पूछने पर बताया बिल्लौरी कहते हैं सब।
वैसे पूनम लोधी है।
बहन चौंक कर बोली क्या तुम लोधी ठाकुर हो?
सही कहा, लगती भी हो बड़े घर की।तुम बेड़नी नहीं हो सकती। और न बेडनिएँ इतनी जल्दी थकती हैं।
थकान का नाम सुनते ही मैं जाकर लोटा भर शरबत ले आई जो सबके लिए बनाया गया था --मटके भर ठंडे पानी में कालीमिर्च, शक्कर, नीबू मिलाकर।
लड़की ने झिझकते हुए कहा सुबह से कुछ खाने को नहीं मिला।
मैं खाना ले आई।
जल्दी जल्दी भरपेट खाना खाकर वह बोली -' जे लोग हमारे कोई नैंया '
--मतलब?
--अब उसकी झिझक खुल गई थी । बोली हमसे एक ग़लती हो गई थी। सौतेली अम्माँ और उसके लड़के बहुत दुख देते थे ।
गाँव भर को मालूम था।
एक लड़का हमसे छुप कर मिलने लगा।
कहता था हम सादी करेंगे।सहर में नौकरी कर लेंगे , सुख से रखेँगे तुम्हें।
एक दिन हम दोनों भाग गए।
लेकिन बस में बैठे दो घंटा हुए होंगे ,एक बसअड्डा पर चार-छह लोगों ने हम दोनों को उतारा ।
उसको खूब मारा और ले गए।उसके भैया लोग थे।
हमें वहीं छोड़ दिया।
वहाँ ये बेड़नी लोग तमासा देख रहे थे हमारा।
वो अम्मा जो नाच रही है बोली चलो हम तुम्हें छोड़ आएँ तुमारे घर।
हमने कहा अब कहाँ घर?
अब कहाँ जाएँगे हम?
तबसे इनई लोगों के चंगुल में हैं।
खाना एक ही बार देते हैं कहते हैं पैरों में दम आ जायेगा तो भाग जायेगी।
दोनों लड़के बड़े गुंडे हैं।
वो तो अम्मा हाथ नहीं लगाने देती कहती है बंबई में लाखों में बेच दूँगी।
बस अब यहां से आगे बंबई की गैल पकड़ने है।
हम दोनों बहनें सुन्न पड़ गईं।
तब तक पिताजी, काका और वो दो गुंडे भी आ गए।
काका हँस कर बोले देखो जा बैठी बिटिया । अरे हमारे गाँव में मजाल है कि कोई बिटियों की इज्जत न करे।
लड़के बोले --ककाजू हम लोगों की भी इज्जत होत है।
लड़की अकेली कहुं चली जाती तो नाक कट जाती।
थोड़ा साहस जुटा कर मैंने कहा ठीक है अब जाओ तुम लोग बाहर ।
ये जरा ठीक होगी तो हम खुद बाहर ले आयेंगे ।
उन गुँडो को बाहर भेजकर मैंने पिताजी और काका को सारी बातें बताईं।
फिर कहा पापा जी हम इसे अपने घर में रख लेते हैं।पढ़ाएँगे।
नौकरी करेगी । आत्मनिर्भर बन जायेगी।
काका हँस पड़े।
पिताजी बोले इतना आसान नहीं है। ये किताबी बातें हैं ।
हम जैसे कमजोर लोगों को जिनको कोई सहारा नहीं है,
उनको दस पचड़ों में फँसा दिया जायेगा।
नाबालिग होगी तो पुलिस ले जायेगी इसे नारी केंद्र में रखेंगे जहाँ एक और नरक।
चलो इसे इसके घर पहुँचा सकते हैं।
--- पता बताओ?
उस लड़की ने चेहरा ऊपर उठाया तो आँखें छलक गईं गहरी साँस भर कर बोली -- नहीं हमारा कोई नहीं है।
खाल उधेड़ देंगे वो लोग हमारी , पहली बात तो घर में आने न देंगे ।
दिन-रात काम पहले भी करते थे अब और पिटेंगे।
रहने दो ।
इतनी देर में लड़के उस औरत अम्मा को लेकर आ गए।
तीनों ने लड़की को पकड़ा और ले जाने लगे।
मैं पिताजी के पीछे थी।
जाते हुए उसने पलटकर मुझे देखा .. दृष्टि मिली ।वह भी समझ गई मैं भी उसके समान शक्ति हीन हूँ।
न उम्र ,न आर्थिक स्वावलंबन न साहस कुछ भी तो नहीं था मेरे पास भी।
वे लोग तीन दिन के लिए आए थे परन्तु उसी रात चले गए थे।
मैं बहुत दुखी होती हूँ ,उस सुंदर लड़की को याद कर, मेरी बातें सुनकर उसकी आँखों में उम्मीद की एक लौ जगी थी ।
फिर कुछ पता नहीं चला।
बियाबान जंगल में जहाँ नदी किसी घड़ियाल जैसी धूप तापती पड़ी रहती थी वहाँ पास एक गहरे भरके में उस उम्र की लड़की की लाश मिली थी । कुछ पता नहीं उसी बिल्लौरी की थी या किसी अन्य बिल्लौरी की ।
किसी भी दरिया का, या नदीधारा का हल्का हरा पानी देखती हूँ या कभी मैदान में सावन की हरियाली का रंग बिखरा देखती ह
हूँ ,बिल्लौरी की आँखों के सपने मुझे दिखने लगते हैं, । जैसे वह कभी-कभी बहती ठंडी रेशमी बयार की छुअन के रूप में कहती है मुझे धरती में ही मिल जाने दो ।
शायद इसीलिए आज भी मुझे राई नृत्य देखना पसंद नहीं है।
