यात्रा वृतांत
अंधेरी रात, घनघोर जंगल और एक खराब गाड़ी! चिल्पी घाटी के खतरनाक मोड़ों पर फंसी यह यात्रा सिर्फ एक सफ़र नहीं, बल्कि जीवन और माया के रहस्यों को जानने की एक गहरी खोज बन जाती है। पढ़िए यह रोमांचक सड़क यात्रा वृत्तांत जो आपको अपनी ही ज़ुल्फ़ों में उलझा लेगा।
एक , सड़क यात्रा वृत्तांत
वह मात्र कृष्ण पक्ष की रात्रि नहीं थी , पूर्ण अमावस्या थी।
जबलपुर से वापस रायपुर आना था।। अमरकंटक एक्सप्रेस में टिकट कंफर्म थे लेकिन वह नई कार जो ठेकेदार की थी वह भी तो साथ में थी उसका फोन आया था गाड़ी लेते हुए आइयेगा
पतिदेवता को सफर से चिढ़ है, अनिवार्यता की अंतिम सीमा हो तभी यात्रा करते हैं । जब भी कहना चाहा चलो तो बोले- ' बस ' का तो नाम मत लेना, कार से भी नहीं । कार नहीं पसंद तो कल कहोगी हाथी , घोड़ा ,ऊंट पर चलो । क्यों -क्यों भटकना बंजारों की तरह ?
मजबूरी में रेल का सफर कर लेते हैं किंतु भाई साहब ने बिना पूछे वो टिकट कैंसिल करवा दिए।
उनका सुतर्क था कि इतनी बड़ी लग्जरी कार खाली जायेगी तो इसी से चलते हैं सीधे घर पर उतरेंगे।
मंडला से आगे निकल कररास्ते में पड़ने वाली बहुत ही कठिन बर्फीली घुमावदार एवं कभी बहुत ऊँचाई चढ़ती हुई तो कभी घाटी में नीचे उतरती हुई हेयर पिन मोड़ों की धनी " चिल्पी " घाटी दिन के उजाले में पार कर लें तो अच्छा है। इस विचार से लाख मनुहार पर भी हम लोग किसी के घर भोजन या चाय तक के लिए नहीं मानें।
रास्ते भर ढाबे मिलेंगे इसलिए चाय और खाने के चक्कर में समय नहीं लगाना है।
इस तरह तुरंत तीन बजे चल तो पड़े लेकिन भाई साहब को कुछ काम जबलपुर में ही करना थे जिसकी वजह से शाम के पांच बज गए, तब जाकर राइट टाउन से निकले ।
आषाढ़ मास था । घनघोर बादल घिरे थे । जबलपुर से मंडला पहुंचने के लिए ' गौर नदी ' का पुल पार किया यह बहुत पतली , कम पानी वाली नदी है ,एक ग्रामीण सीधी-सादी स्त्री की भांति सिर झुकाए अपनी राह जाती है और आगे नर्मदा नदी में विलीन हो जाती है।
जब नर्मदा क्रोध में बाढ़ रूप में गर्जना करती है तब तो उसके प्रबल वेग में गौर नदी का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है।
कुछ अच्छे बड़े ढाबे दिखाई दिए परन्तु पहले ही बहुत देर हो चुकी थी इसलिए सोचा आगे देखेंगे ।
बिछिया ,मंडला तक का और मंडला से आगे जब तक मध्यप्रदेश की सीमा है वहां तक रास्ता बहुत खराब है।
बीसों साल से वैसा ही गढ्ढे ही गड्ढे ,जब सृष्टि का निर्माण हुआ होगा, धरती बनी होगी तब से जबलपुर से मंडला तक जैसी रही होगी यह जमीन ...., उसके मूल रूप को आज भी शासन ने जतन से सहेजकर रखा है।
इस रास्ते पर चलने से चाँद और मंगल ग्रह दोनों पर चलने का सुख यहीं मिल जाता है।
मंडला छोटा जिला है ,शान्त, गुमसुम,कम रोशनी वाला ।
मौसम भयानक बारिश को संग लिए आगे आगे चल रहा था इसलिए चाय की दुकान, ढाबे बंद मिलने लगे ।
अपार नीली जल राशि वाली तमसा जो प्रलय की निबिड़ रात्रि में भी अवस्थित मानी जाती है, ने तीन तरफ से मंडला को इस प्रकार घेरा है मानों अपने अंक में बिठा लिया हो । मंडला केवल एक सड़क मार्ग से जबलपुर से जुड़ा हुआ है।
रास्ते में बरगी नहर मिलती है। कुछ किलोमीटर आगे बरेला मंदिर बहुत प्रसिद्ध है,अगली बार अवश्य दर्शन करेंगे। फिर बीजाडांडी अच्छा गाँव है शान्त ,मौन जैसे कोई साधु भीड़भाड़ से दूर बसा हो । बिना रुके चलते गए हम लोग।
बुरी तरह टूटा -खुदा हुआ और गड्ढों से भरा हुआ मार्ग, जगह-जगह सड़क बनाने कि सामान रेत, गिट्टी, बोल्डर, डामर के ड्रम, बचा हुआ रास्ता रोके पड़े थे । इस सबको पार करने में बहुत अधिक धैर्य और समय लगता है।
रुक कर प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने के लिए समय नहीं बचता।
नेशनल हाईवे -30 का निर्माण बहुत समय से चल रहा है। आफत की सड़क के आधे अधूरे घटिया निर्माण से जनता बहुत परेशान हैं। कहते हैं विकास सड़कों के रास्ते आगे बढ़ता है, यही न हो तो गति में अवरोध तो आयेगा ही।
पौराणिक ग्रंथों में जबालि की तपस्थली होने के कारण जाबालिपुरम एवं चौथी शताब्दी में जो जाउलीपत्तन भी कहा जाता था, उस प्राचीन नगर आज के जबलपुर से सटा हुआ यह मंडला भी अनेक पौराणिक, ऐतिहासिक, प्रसिद्ध राजनीतिक घटनाओं को सहेज कर रखे हैं।
गोंडवाना भूभाग का यह खंड 1480 से पहले महिष्मति नाम से प्रसिद्ध था।
संग्राम शाह मंडावी राजा थे उनके नाम से मंडला , रानी दुर्गावती के समय गढ़ मंडला के नाम से विख्यात हुआ।
रानी दुर्गावती महोबा के प्रसिद्ध चंदेल वंश की राजकुमारी और गढ़कटंगा के गोंड साम्राज्य के महाराजा दलपत शाह की रानी थीं। युद्ध के मैदान में आँख में लगा तीर अपने हाथ से निकालने वाली वीरांगना ने जिस प्रकार अकबर की सेना के छक्के छुड़ा दिए थे उसकी मिसाल अन्य नहीं है। यहीं की अंग्रेजों से लोहा लेने वाली रानी अवंतीबाई भी दुर्दम्य साहस के लिए विख्यात हैं।
इन्हीं वीरांगनाओं के कारण जुगनू जितना मंडला इतिहास में अलग ही चमकता है।
धीरे- धीरे आगे सीधी चिकनी राह मिलने लगी अब लगा कि यह नेशनल हाईवे है , एन एच -30 ,। तीन घंटे की धचर -धचर से राहत मिली --इस बात से सबने चैन की सांस ली । आगे मैकाले पर्वत की जादूगरनी चिल्पी घाटी की राह प्रारंभ हुई।
रात के अंधेरे में इतनी घुमावदार सड़क सकरी भी , कभी ऊपर चढ़ती हुई मुड़ जाती कभी हेयर पिन मोड़ की तरह एकदम मुड़ कर नीचे फिसल जाती है। किसी जादूगरनी की अनेकों बलखाती पेंचदार ज़ुल्फ जैसी खूबसूरत और चुंबकीय आकर्षण वाली है चिल्पी घाटी। बड़ा रोमांचक सफ़र होता है यह । लगभग पचास किलोमीटर का रास्ता तय हुआ था सरपट फिसलते हुए।
अब कोई ढाबा नहीं मिलने वाला था । भ्रमण करने के नाम पर हम भाई-बहन बहुत पक्के हैं--हम दोनों को भूख प्यास नींद थकान कोई चीज परेशान नहीं कर पाती है , हम दोनों ने छुपी नजरों से मेरे पतिदेव को देखा जो गुस्से में दिख रहे थे । हंसी छुपाने के लिए , मैं पूरी तरह खिड़की की तरफ घूम गई।
एक तरफ गहरी खाई दूसरी ओर पहाड़ी दीवार साथ -साथ चलती हुई -सी। बहुत सन्नाटा पसरा था छोटी झाड़ियां बड़े दादा वृक्ष पंछी-पखेरू सभी गहरी नींद में थे।
कुछ तारे झिलमिलाते दिखे ।
खगोलविद कहते हैं कि धूल कार्बन कणों व अन्य दूषित गैस-कणों के बहुत बढ़ जाने के कारण वातावरण की पारदर्शिता कम हो गई है इसीलिए नगरों के आकाश में तारे कम दिखाई देते हैं। जंगल में तारे गिनने का अवसर बार-बार नहीं मिलता किंतु आज बादलों के कारण यह मौका गया।
अचानक टायर से आवाज सी महसूस हुई ड्राइवर ने गाड़ी रोक कर देखा और कहा -
'पंचर'!!!
टायर बदलना होगा। उसने गाड़ी जितनी संभव थी उतने किनारे खड़ी की , डिक्की खोली ,बैग हटाए लेकिन स्टेपनी कहीं नहीं थी ।
कार कोई नया माडल थी । भैय्या लगातार फोन यूज करते हैं सो उनके फोन की बैटरी खत्म हो गई थी।
ठेकेदार का नंबर याद नहीं था।
स्टेपनी कहीं नहीं थी ।
कुछ देर इधर उधर देखकर पतिदेव बोले बहुत दूर कहीं रोशनी सी दिख रही है , टायर डबल लेयर होते हैं कार , थोड़ा तो चलेगी ।
शायद मौसम .. शायद संयोग वाहनों का आना जाना बंद था।
वह पंडाल जैसा बड़ा ढाबा ही था
खाना बंद हो चुका था ।ठंडी हवा से बचने रात्रि विश्राम के लिए रुके हुए ट्रक ड्राइवरों ने तीखी ठंडी हवा से राहत पाने अलाव जलाया था , जंगली जानवर भी दूर रहते हैं।
भैय्या ने वहां जाकर कुछ बात की और काम बन गया।
कार पहले ही उस ढाबे से दूर अंधेरे में रोकी थी । ड्राइवर ने चक्का खोला और पंचर बनवाने ले गया।
भैय्या भी साथ में गए। पतिदेव भी गाड़ी से निकले और जाते हुए मुझे धीमी आवाज में समझाया --तुम बाहर मत आना ।
क्या पता कौन लोग हैं कैसे हैं फालतू रिस्क क्यों लेना। सामान की तरह बैठी रहना ।
ये तीनों उस ढाबे में समा गए कौन जाने चाय -शाय भी कुछ हो ।
खिड़की के बाहर का कोमल घना अंधयारा जैसे मुस्कुराया हो
यहीं मुझसे गलती हुई , उससे दृष्टि मिली और उसके सम्मोहन में बंधी मैं धीरे से दरवाजा खोल कर बाहर चली गई।
ढाबे से विपरीत दिशा में तेज तेज कदम बढ़ाकर जरा दूर जाना चाहती थी ।
मन ..बुद्धि .. आत्मा सभी कह रहे थे --जीवन में ऐसा दृष्य न पहले कभी मिला और न फिर कभी मिलेगा । ऐसे घटाटोप अंधयारे वाली आषाढ़ी अमावस्या , घना जंगल ठीक आधी रात का सन्नाटा , जो कसर थी वह भरे बादलों ने पूरी करदी थी सारे तारों को ढांक कर ।
मैंने दोनों हाथों को यहां वहां लहराकर उस परम चेतना को अनुभूत करना चाहा । यह अनंत का वैसा ही कितना घना अंधयारा था ,जब अंतरिक्ष नहीं था, न जल न वायु न अग्नि .. उस अंधयारे में एक " मैं " घुलता जा रहा था , मैं यह शरीर भी नहीं , मैं मन भी नहीं ... फिर मैं कौन हूं ? यहां सृष्टि के आरंभ का वह गोपनीय क्षण था जब एकोहम्
का अनहद नाद व्याप्त था ।
यह ' मैं ' कौन ?
शायद यही माया है । वह दिन के उजाले में आदमी की आपाधापी, भागदौड़,पढ़ाई , कैरियर, शादी , बच्चे और फिर फिर वही सिलसिला , वे झगड़े, धरने , आंदोलन ,बहस, अदालतें, बंटवारा और विरासतें, रियासतें
सब कितना बनावटी है ।
सब माया का जाल है।
यह वह आदि अंधयारा है जहां आकर हम ठग माया के जाल को जान सकें।
शायद ...जब तक प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता तब तक यह यात्रा- वृत्तांत अधूरा ही रहेगा।
-- 'मैम सा. वापस आइए , यहां जंगली जानवरों का भी खतरा है ।'---
महाठगिनी माया बुला रही थी।
