My Sentiments Studio

Bioscope

13June2026

कभी कभी यूँ.....

शाम के धुंधलके में छत पर अचानक एक सुनहरे पंखों वाले शानदार उल्लू से मेरा सामना हो गया! उसकी अफ़सर जैसी अकड़ और घूरने वाली नज़रों ने मेरी साँसें रोक दीं। क्या वह सचमुच लक्ष्मी जी का वाहन था? पढ़िए डर, आश्चर्य और एक मज़ेदार अंत से भरा यह रोचक किस्सा!

By Shashi Khare2 min read

कल जरा विश्रांति के लिए , कुछ भरपूर साँसे लेने विदा लेती संध्या के समय छत पर जाकर बैठ गई थी।
कुर्सी बहुत आराम दायक थी । ग्रीष्म के मौसम में संझा की ठंडी बयार में निश्चिंत हो आँखें बंद कर बैठना , इससे बड़ा सुख और क्या होगा।
छत की मुँडेर से हाथ भर की दूरी थी ।
आकाश में तारे ढूँढने का यत्न कर रही थी तभी सहसा एक मजबूत सा पक्षी आकर बैठ गया।
हल्की सी गोरैया होती तो उसके फरों का अलग पता चलता थोथा चना बाजे घना की तरह।
उस पक्षी पर नज़र पड़ते ही मेरा रुआँ-रुआँ सतर्क हो गया ।
यह उल्लू है।
आज तक मात्र चित्र देखे थे , साक्षात कभी नहीं देखा था।
उसकी पीठ मेरी तरफ थी।
चौड़े कंधे इतने सतर, अकड़ से तने हुए जैसे कोई असीम पावर वाला आफीसर हो ।
पालिश किए हुए या एकदम ब्रांड न्यू धूमिल काले पंख सुनहरे रंग के साथ।
गर्दन और कंधों पर दूर तक सुनहरा रंग ।
वह ग्यारह -बारह इंच से अधिक नहीं था।
मैं मन ही मन कह रही थी --पीछे मत मुड़ना , डर लग रहा है पर वह पलक झपकने से पहले 359 डिग्री पर मुड़ गया और मुझे देखने लगा , शायद ( रात हो गई थी अंधेरा तो था परन्तु बिजली के खंभे से आती रोशनी में वह खुद चमक रहा था )
मैंने अभी तक ऐसा उल्लू चित्रों में भी नहीं देखा । इतना अविश्वसनीय सुंदर ।
साँसे रोक लेना चाहिए ताकि वह जरा भी डिस्टर्ब महसूस न करे ।
जल्दी ही अपने धूमिल और स्वर्णिम पंख फैला कर उड़ गया ।
कौन था?
ऐसा कभी नहीं देखा -सुना ।
क्या लक्ष्मी जी अपने विशेष वाहन पर आईं हैं और गाड़ी यहाँ पार्क कर पैदल घूम रहीं हैं ।
ऐसा खूबसूरत उल्लू
क्या कहलाता है।
कहाँ होता है ।
रायपुर में किधर से आया था।
जरा भी गप नहीं है, वह सचमुच सोने के पालिश वाला लग रहा था।
अपनी आदत के अनुसार वह जरा भी नहीं मुस्कुराया।
घूरता ही रहा। फिर चला गया।
आखिर वह क्या था?
नीचे आकर मैंने अनमोल से कहा
मैं डर गई थी और मन-ही-मन कह रही थी --नहीं पीछे मेरी तरफ मत मुड़ना । पीछे मत देखना, नहीं ... नहीं मेरी तरफ मत देखना , लेकिन वह मुड़ गया।
तो मैंने बिना बोले मन ही मन में कहा-- मुझे जाने दो, जाने दोओओ
तुम्हारे बारे में किसी से कुछ नहीं कहूँगी।
अनमोल कहीं जा रहा था।
जूते की लैस बाँधते हुए धीरे से मुस्कुरा कर कहा--मम्मी!
--वह सोचता होगा उल्लू तो मैं हूँ !
मैंने बात के अर्थ को समझते हुए दाँत पीसकर कहा --क्या....!
वह हँसा और दौड़ कर निकल गया।
अनमोल को तो मैं देख लूँगी।।।।।