डार्क हॉर्स
112 पन्नों की भदेस भाषा और खीझ से शुरू हुआ सफर क्या अंत में सुकून दे सकता है? 'डार्क हार्स' सचमुच एक छुपा रुस्तम है, जिसके अंतिम 25 पन्ने पूरी कहानी पलट देते हैं। जानिए कैसे यह उपन्यास अंत में बेहतरीन बनकर पाठक को चौंका देता है। पढ़ें यह दिलचस्प समीक्षा!
डार्क हार्स
एक सौ बारह पेज निकल गए तब जाकर एक अश्रु सिक्त दृश्य सामने आया -
मैं जब आइएएस नहीं बन पाया तो माँ ने अंतिम समय वचन लिया कि 500 लोगों को प्रापर आईएएस बनाना ही है।
बटोहिया सर के इस संकल्प को सुनकर विद्यार्थियों की आँखें भर आईं....
किन्तु पाठक की आँखें नहीं भरती न ही जरा भी मन पिघलता है।
पार्टी, खाना-पीना, गालियों में बातें , खाने, रहने नहाने की असुविधाएँ --यही संघर्ष है ?
जिसका दम भर रहे हैं भूमिका में मित्रगण ।
अंत आते-आते भाषा भाव लक्षण सभी ने तरक्की की ।
अंतिम पच्चीस पेज बेहतरीन हैं।
पाठक शान्ति की साँस लेता है ।
पात्रों की आड़ लेकर नेरेटर ने भी भरपूर भदेस भाषा का उपयोग किया है ।
बिहार और यूपी के लोग इसी अंदाज में बात करते हैं।
पूरे बिहारी माहौल को उपस्थित करने में सफल हैं।
लेखन में कसावट नहीं है न पाठक को बांधने की क्षमता
जिन्हें ऐसे बेहूदा शब्दों की आदत नहीं न ऐसे परिदृश्यों की वे जल्दी जल्दी पृष्ठ पलटते हैं।
अंतिम बीस पच्चीस पेज में लेखन और कथानक दोनों संभल गए हैं।
अंत भला हो सब भला।
वास्तव में उपन्यास भी एक डार्क हार्स ही है।
उम्मीद नहीं थी अंत में पाठक की खीझ , शान्ति में राहत में बदल जायेगी।
