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Bioscope

13June2026

व्योमकेश दरवेश

क्या महान साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भी ईर्ष्या और षड्यंत्रों के शिकार हुए थे? विश्वनाथ त्रिपाठी रचित 'व्योमकेश दरवेश' उनके अनछुए जीवन, संघर्षों और गुरु-शिष्य के अद्भुत रिश्ते का मार्मिक दस्तावेज़ है। साहित्य प्रेमियों के लिए एक अनिवार्य पाठ!

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"व्योमकेश दरवेश"(जीवनी संस्मरण)

लेखक-विश्वनाथ त्रिपाठी

- एक अवश्य पठनीय पुस्तक -

वर्जीनिया वुल्फ ,  "हाऊ शुड वन रीड अ बुक"  इस निबंध के अंत में लिखती हैं --कयामत के दिन की बात है, ईश्वर संत पीटर की सलाह से धरती से आए अध्यापकों, डाक्टरों, वकीलों को उनके किए गए कर्मों के आधार पर पुरस्कार बाँट रहे हैं। कुछ लोग अपनी पुस्तक बगल में दबाए सामने आए। ईश्वर पीटर से जानना चाहते हैं कि पुस्तक दबाए लोगों को क्या देना है?

पीटर ईर्ष्या से भरे हुए धीमे स्वर में कहते हैं -इनको देने के लिए हमारे पास कुछ भी नहीं है। ये धरती पर पागल पैशन लिए हुए पाठक रहे हैं। इनको कुछ भी दिया जा सकना  संभव नहीं है।"

धरती पर असंख्य ऐसी किताबें हैं जो स्वयं में एक पूर्ण सृष्टि हैं, पीटर जिनसे ईर्ष्या करते हैं और ईश्वर आनंद।

व्योमकेश दरवेश  विश्वनाथ त्रिपाठी जी की एक ऐसी ही पुस्तक है जिसमें आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन -संसार साँसें ले रहा है। विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने  सन 45 से अपने माध्यमिक स्कूल में आचार्य हजारी प्रसाद जी के प्रथम परिचय से लेकर उनके अवसान के बाद तक का बहुत बड़ा कालखंड समाहित किया है।

हजारी प्रसाद द्विवेदी जी पर बहुत लिखा गया है।

अनगिनत पत्रिकाओं ने उनपर विशेषांक निकाले हैं और उनके साहित्यिक अवदान पर बहुत किताबें लिखी गई हैं, बहुत शोधकार्य हुआ है, तो क्यों पढ़ी जाए यह पुस्तक?

द्विवेदी जी की विशिष्ट शैली में जो  सरस आत्मीयता है

उससे पाठक बँध जाता है,उनकी लोकप्रियता आज भी बहुत है । ऐसे साहित्यकार की जीवन यात्रा जो एक कहानी जैसी ही है उसे जानना उनकी कृतियों को जीवन के  विभिन्न मोड़ों से संदर्भित कर समझना एक अद्भुत अनुभव होगा।

त्रिपाठी जी ने उनके समस्त साहित्य की मूल धारा का एक-एक ताने-बाने का गहन विवेचन किया है।

आचार्य द्विवेदी जी के गुणों का बखान बहुत मिलता है , त्रिपाठी जी ने उनकी तमाम कमजोरियों को भी देखा है--आचार्य जी की निर्णय लेने में असमंजसता, अतिरिक्त असुरक्षा बोध, अति भावुकता, अति संकोच जिनके कारण वे बहुत परेशानियाँ उठाते थे । इन स्थितियों का उल्लेख करते हुए त्रिपाठी जी की खीझ, गुस्सा, बेचैनी और असहायता का भाव शब्द शब्द में झलकता है।

यह उनका अपने गुरुमित्र, अग्रज  के प्रति विकल आत्मीयता है, जुड़ाव है।

इस अद्भुत अनुपम रिश्ते का दूसरा उदाहरण नहीं है , यह प्रेमसिक्त आदरेय रिश्ता पृष्ठ दर पृष्ठ मिलता है । इसके लिए भी यह पुस्तक पढ़ी जाना चाहिए।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के बालपन के रेखाचित्र बहुत रोचक हैं।शाला प्रवेश से लेकर भिन्न -भिन्न स्थानों में होने वाली शिक्षा -दीक्षा, छोटी -छोटी घटनाएँ, जब वे  मात्र हजारी दूबे थे, उनके शिक्षक --अच्छी पिटाई लगाने वाले बाँके द्विवेदी, उनकी प्रतिभा

पहचानने वाले और बहुत स्नेह साथ-साथ पीटने वाले रामनरेश मिश्र  साक्षात हो जाते हैं।

छोटी-बड़ी घटनाएँ -कालेज की फीस माफ करवाने गए द्विवेदी जी पर प्राचार्य ध्रुव का गुस्सा --" यूनिवर्सिटी गरीबों के लिए नहीं है, जाओ गारा -ईंटा ढोओ "  तब कमरे में आकर रोते आचार्य जी ---विश्वनाथ जी जैसे  चलचित्र दिखा रहे हों इतनी सशक्त वर्णना है।

जब यश मिला तो साथ के प्राध्यापकों ने ईर्ष्यालु होकर जो षड्यंत्र, अपमान, आघात के कुचक्र रचे  उन्हें जानकर बहुत क्लेश होता है। इन तमाम बातों को स्पष्ट और विस्तार से लिखा गया है। हिंदी साहित्य के संसार में ऐसा क्यों हुआ है, निराला  ने भी उपेक्षा और असहयोग के कारण आजीवन अभावों भरा जीवन जिया है।

प्राध्यापकों को जो अपने छात्रों में प्रिय होना चाहते हैं उन्हें शिक्षण विधि की विभिन्न विधियों के रोचक रूप मिलेंगे।

द्विवेदी जी कक्षा में अनौपचारिक रहते थे। एकाध बार ऐसा भी हुआ कि उन्होंने कहा --' यह अर्थ खींच खाँच कर लगा रहा हूँ, तुम लोग प्रयास करो। यदि कोई सुझा देता तो प्रशंसा करते थे और अट्टहास से कक्षा गूँज उठती।

इसी आधार पर त्रिपाठी जी एक सूत्र देते हैं --अपने विद्यार्थियों में घुल-मिल कर एक 'अध्यापक '  'गुरू' का दर्जा प्राप्त कर सकता है।(152)

इसी बात को विस्तार देते हुए त्रिपाठी जी ने अनेक सफल  छात्रों में प्रिय प्राध्यापकों की विशेष शैली के उद्धरण दिए हैं।

" विश्वनाथ मिश्र काव्यशास्त्र और घनानंद इतना अच्छा पढ़ाते कि छात्र स्तब्ध -मुग्ध हो रहते। वे ललकारती लय मुद्रा में सूत्रों का विश्लेषण करते। छात्र उसे सगर्व आत्मीयता से अनुभव करते कि ऐसा कोई और पढ़ा नहीं पायेगा। वे  घनानंद की पंक्ति में आसपास का अर्थ

आस पास नहीं -- आशा का पाश बताते ...आँखें आशा के पाश यानी जाल में उलझी रहीं।

बायस पलि अहि अति अनुराग आ

कबहुँ  निरामिष होहिं कागा,

बायस नहीं  पायस ..।

पायस..खीर खिला-खिला कर पालो। बायस मानने में अर्धाली में कागा की पुनरुक्ति होती है।"