पीले फूल कनेर
क्या आधुनिक कहानियों से 'किस्सागोई' की मिठास खो गई है? शशि खरे का संग्रह "पीले फूल कनेर" इसी खोती परंपरा को पुनर्जीवित करता है। स्त्री-विमर्श, पर्यावरण और लोक-कथाओं से बुनी इन 21 मार्मिक कहानियों की शानदार समीक्षा पढ़ें और साहित्य की दुनिया में खो जाएँ!
दाँझणा: पीले फूल कनेर के
[कहानी-संग्रह-पीले फूल कनेर। कथा लेखिका-शशि खरे। प्रकाशक-शिल्पायन, नई दिल्ली। मूल्य-300/-। संस्करण-2021]
भले ही हम डिजिटल दुनिया में रह रहे हैं, जिसमें बहुत सारी विषयवस्तु मोबाइल, इंटरनेट इत्यादि पर मिल जाती है, लेकिन जो सुकून हमें किताबों में किस्से-कहानियाँ पढ़ने में आता है वह कहीं-और नहीं आता। किस्सा, जीवन की या व्यक्ति की किसी सच्ची घटना को दर्शाता है, जबकि कहानी जीवन की घटनाओं का धारावाहिक प्रकाशन है। -----कहानी काल्पनिक हो सकती है और वास्तविक भी। मनुष्य के जन्म के साथ ही कहानी का जन्म हुआ और कहानी कहना तथा सुनना मानव का आदिम-स्वभाव बन गया। जगत-नियंता आदि-शिव द्वारा माता पार्वती को सुनाई कथा से लेकर किस्सागोई और फिर दादी-नानी की कहानियों से पुष्पित-पल्लवित आज की हिन्दी-कहानी कैसी भी हो—वर्णनात्मक, ऐतिहासिक, आत्म-कथात्मक, प्रतीकात्मक, चरित्र-प्रधान, सामाजिक-संदर्भों पर आधारित, मनोवैज्ञानिक, घटना-प्रधान, भाव-प्रधान, वातावरण-प्रधान, नई-कहानी, अचेतन-कहानी या फिर चेतन-कहानी— ज्ञानवर्धन के साथ-साथ लोक रंजन उसकी पहली और अहम शर्त होती है।
शशि खरे का सद्य प्रकाशित, बहुरंगी आवरण युक्त, सजिल्द कहानी संग्रह “पीले फूल कनेर” जब पढ़ने को मिला, तब तक हम उनकी कुछ कहानियाँ और ‘झाबुआ’ संस्मरण को ‘गद्य-गगन’ (साहित्यकारों का व्हाट्स ऐप ग्रुप) के मंच से पढ़ चुके थे। संग्रह की एक अन्य कहानी ‘कोसी के घाट पर’ को हमने ‘साहित्य-संस्कार’ के जनवरी से मार्च-2021 अंक में प्रकाशन किया था, जिस पर पाठकों के बीच में अच्छा प्रतिसाद मिला है।
वैसे तो संग्रह की सभी कहानियाँ, कहानी-कला की कसौटी पर कसी हैं, परंतु जिन कहानियों ने हमें ज्यादा आह्लादित किया या प्रभावित किया उन पर चर्चा करना चाहूँगा। शुरुआत करते हैं, पहली कहानी ‘बोनसाई’ से—इस कहानी में प्रकृति-चित्रण की सजीवता है जो कथा-लेखिका के प्रकृति-प्रेम का परिचय देते हुए उनकी अजेय वर्णनात्मक कथा-शैली का जय-घोष कर रही है। वातावरण में मध्यवर्गीय जीवन-शैली है, जिसमें पतियों को पैसा कमाने और बटोरने का रोग है, पत्नियों को उड़ाने का। बी. प्रभा की पेंटिंग और बगीचे में बोनसाई स्टेटस-सिंबल है। कथावस्तु में कसावट है, 2-3 दिसंबर 1984 की वह दरमियानी रात थी, जब भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड फेक्टरी से मिथाइल आइसो सायनाइट (मिक) का रिसाव हुआ और देखते-देखते 15000 से अधिक लोग काल-कवलित हो गए, जिनमें इस कथा का नायक मोहन भी रहा। हमारे एक मित्र, गिरीश गांधी, जो आईएएस की परीक्षा देने केपिटल होटल(भोपाल) में रुके थे, उस रात्रि जब घुटन हुई तो ठंढ के बाबजूद पानी से भीगे कंबल से मुँह ढाँककर सो गए और बाल-बाल बचे, उन्हें भुनसारे (अगली सुबह) केंद्र पर पहुँचने पर परीक्षा स्थगन की सूचना से इस घटना का पता चला। गैस-त्रासदी से प्रभावित दूसरी-तीसरी पीढ़ियाँ आज भी पुराने भोपाल में दिखाई दे जातीं हैं। और, कहानी के अंत में, नायिका गेंदा रासायनिक खाद का उपयोग कर विकसित बोनसाई [कला] का पुरजोर विरोध करती है।
प्रकृति-प्रेम या यूं कहें पर्यावरण-जागरूकता पर एक दूसरी स्तरीय रचना है, “चल गोरी घर आपने”। प्रतीकात्मक कथा है, मुख्य भूमिका में प्रकृति है, कथा-लेखिका सहनायिका बतौर इसमें जागरूक दिखाई देती है, कभी गौरैया को दाना डालकर तो कभी घुरकैया बाबा की जय बोलकर। माँ से सुनी नल-दमयन्ती की कथा में बुरा समय आने पर दमयन्ती के चटख पीले और लाल लहरपटोरा रेशमी वस्त्र उड़ जाते हैं, जिन्हें जंगली झाड़ी (केली) ने छुपा लिए थे, वे ही सुंदर केली के फूल ‘प्रतीक’ हैं। रानी के वस्त्र चुराने से इन झाड़ियों को और इनके फूलों का मान नहीं हैं। शायद वे (शापित झाड़ियाँ), दमयन्ती की चिन्हारी (लहरपटोरा) वापस लौटाने की प्रतीक्षा करती रहेंगी।
प्रेम और सौन्दर्य पर आधारित कहानी है, ‘किस्सा तोता और मैना का’। परंपरागत कथा-कहन शैली, प्रेमा और कन्हैया की प्रेम कहानी--- सूखे जले ठूंठ सा रंग, बहुत गहरे कुएं में डूबी गागर जैसी आँखें, पेड़ की डाल जैसी नाक। पास–पड़ोस की काकी, भाभी कहती हैं, कन्हैया तुम्हारी दुल्हन काली है, पर बड़ी निराली है, जाने क्यों सुंदर लगती है। कन्हैया सब देख पाता था, मन की आँखों से, वह कहता, ‘प्रेमा तुम कितनी सुंदर हो’।
ऐसी ही एक और कहानी है, ‘जादू’-जिसमें हर जगह आनंद है, प्रत्येक घटन में आनंद है, सबसे बड़ी बात कहानी में भी जादूगर आनंद है। कहानी के पात्र; पुणे, मुंबई जैसे शहरी कोलाहल से बचने के लिए एकांत ढूंढते हैं- परंतु वे सामाजिक प्राणी हैं, अकेलेपन की कल्पना नहीं करते।
स्त्री-विमर्श की शुरुआत करती कहानी है, ‘चलती चक्की देखकर’। मुद्दा यह है कि “हम अधेड़ हो गए हैं, पर अपने विचार सामने रखने का, कोई भी निर्णय लेने का अधिकार हमें अभी भी नहीं”। पापा और दादा के गोत्र में उलझी अनन्या की माँ कहतीं हैं, “जो इन लोगों की कलफ़ लगीं मूंछे हैं, न यही सारी मुसीबतों की जड़ हैं”। स्त्री विमर्श को आगे बढ़ते हुए शशि, ‘बीती रात’ कहानी में कहतीं हैं कि “क्या ऋषि गालव की उस कथा पर गर्व करें, जिसमें वे वे माधवी नामक राजकुमारी को एक वस्तु की तरह ले आए थे। न दान देने वाले पिता को दर्द हुआ की वह जीती-जागती कन्या को समान की तरह दे रहे हैं। न ऋषि को प्रतीति हुई कि वह एक युवती के प्रति अन्याय कर रहे हैं”।
“कभी तो ये मन के अंधेरे” एक घरेलू हिंसा से पीड़ित स्त्री कंचन की कहानी है, केन्द्रीय पात्र या नायक चर्चाओं से इतर सिर्फ संकेतों में दिखाई देता है। ‘वो जो भी हो भूत या आत्मा या इंसान उसने बहुत अच्छा किया’ कहते हुए नायिका के चेहरे पर जीत की खुशी देखते ही बनती है।
सहज, स्वाभाविक गति से आगे बढ़ती वर्णानात्मक कहानी ‘कोसी के घाट पर’ 2014 में “वर्तमान साहित्य: कमलेश्वर कहानी प्रतियोगिता” में पुरुस्कार प्राप्त है। सज्जनपुर के मंगल शास्त्री की पहली पत्नी पदमा पारिवारिक रूढ़िवादिता से खुद को आजाद करती है, नए सिरे से पढ़ाई करती है, प्रोफेसर बनती है। स्त्री विमर्श की परतें खोलती यह कहानी पठनीय है। पात्रों का चरित्र चित्रण इसकी विशेषता है।
‘हैलो-85’, केदार नाथ हादसे के बाद प्रकृति से छेड़-छाड़ के विरुद्ध सचेत करती इस कहानी की धमाकेदार शुरुआत है। 25 फेसबुक फ्रेंड्स हैं, उनका गेट-टुगेदर है। ये वे युवा हैं, जो गधे या बैल की तरह का जीवन नहीं जीना चाहते। समाज सेवा करते हैं, बिल्ली रास्ता कट जाये तो हँस कर कहते हैं, ‘ओ नो केटी, किसी का रास्ता काटना बुरी बात’। चरम पर पहुँच कर यह कहानी कुछ पिछड़ती दिखाई दी।------विडंबनाओं और विद्रूपताओं के बाद भी यदि हम जीवन-मूल्यों और आदर्शों की रक्षा कर पाते हैं तो जीवन की सार्थकता होती है। और, यही तो कहानी का उद्देश्य भी होता है।
टाईटल स्टोरी- “दाँझणा-पीले फूल कनेर” एक आशावादी कहानी है, सकारात्मक है। कहते हैं, मानव के सामने जिंदगी और मृत्यु एक ऐसे रूप में आती रही है कि दार्शनिकों, चिंतकों, समाज-सेवकों और साहित्यकारों ने भी भारत के ऋषि-मुनियों के साथ मिलकर इस पर सतत विचार किया है। दर्शनशास्त्र के अनुसार, “ध्रुवो हि जातस्य मृत्यु” अर्थात जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु सुनिश्चित है। एक पद है----कै बिरहनी को मीचु दे, कै आप दिखलाई । आठ प्रहर का दाँझणा मोसे सहा न जाई।
[गूगल सर्च में इसे बैरागी कबीर की रचना बताया है, परंतु प्रामाणिक नहीं है, बीजक, कबीर-ग्रंथावली, कबीर-समग्र में यह संकलित नहीं है। कहानी में इसे मीरा की रचना बताया गया है। इसका अर्थ है, मैं चौबीसों घंटे तुम्हारे विरह में जलता रहता हूँ। या तो मुझे अपना दर्शन दो अथवा मृत्यु। यह विरह सहन नहीं कर पा रहा हूँ।] दाँझणा उस आग को कहते है जो किसी को दिखती नहीं है पर व्यक्ति को अंदर ही अंदर जलाती रहती है। जिंदगी ईश्वर का वरदान है यह मानते हुए पूरी जिजीविषा के साथ जूझना और जीना ही इस कहानी का संदेश है।
झाबुआ, एक संस्मरण है। वहाँ बिताए स्कूली दिनों की यादें, काले डामर की धुली साफ सड़कों पर खड़िया से लाइन खींचकर चींटी धप्प खेलना, गोटे से सजे पीले लंहगे लुंगड़े, माँड़ना, रुदाली, संझा बाई के गीत गाकर अच्छे लाड़ो को चाहत रखतीं गुइयाँ इत्यादि में कथा-रस डालकर कहानी-कारा ने एक आत्म-कथात्मक स्वरूप दे दिया है। ‘जिंदगी के सफ़े’ एक डायरीनुमा कहानी है। कहीं की ईंट और कहीं का रोड़ा जोड़कर बना भानुमती का कुनबा यानी ‘नयी कविता’ से नवोदित रचना का विभ्रम, अंत में एक मधुर हास पैदा करता है। अंतिम दो कहानियां ‘नौकरी’, ‘यहीं कहीं है रास्ता’ में जबलपुरिया अंदाज है, माँ नर्मदा का धवल सौन्दर्य है, त्रिपुरी का गौरव है, “आज के युग में मोबाइल तो पेसमेकर होता है” जैसे सूक्त हैं, शक्तिनगर वाले डॉ नागपाल हैं। संभाषण शैली से पात्रों का चरित्र-चित्रण विशेष है।
सरोवर नगरी का महात्म्य समझाती “सागर” मेरी पसंद की कहानी है, और हो भी क्यों न? वहीं मेरा जन्म हुआ, सागर के तट पर मेरा घर है, नाल गढ़ी है मेरी वहाँ। बचपन से सुनते आ रहा हूँ यह लोक कथा, जो प्रतीकों में है, गहरे अर्थ रखती है, इसके मतलब निकलने पड़ते है। इस कहानी में बेटा-बहू प्रतीक हैं सुख, आराम, सुनिश्चित जीवन और भविष्य के। समाज की भलाई के लिए अपने सुखों और आरामदायक जीवन चर्या का बलिदान करना पड़ता है, जैसा कि लाखा-बंजारा ने [अपने बेटे(सागर)और बहू (दरियाब) का] किया। कहते हैं हर दीपावली की रात हजारों दियों की रोशनी में सोने की जंजीरों का झूला और उस पर झूलते उस अद्भुत जोड़े की पारलौकिक अपूर्व चमत्कारी झांकी को देखा जा सकता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि दादी मणि बेन जैन इस कहानी में किस्सागो की भूमिका में हैं। वे किस्सा सुनाती है परंतु उनकी दो शर्तें होती हैं, एक, “कहानी को आगे भी अपनी नयी पीढ़ी को सुनाना” और दूसरी, “लगातार हूँका देते रहना”।
अग्रजा शशि ने इस लोक-कथा के विन्यास में जहां एक ओर किंवदंती के साथ कथा-कहन की महान परंपरा को नव-जीवन दिया वहीं “बंजारों का बंजर” और “सूपा-कॉलेज” जैसे उपमानों का कथागत प्रयोग कर यह दर्शाया है कि देशकाल और परिस्थिति पर उनकी पैनी नजर है।
शशि खरे की कहानियों के बहाने एक गुफ्तगू में नमिता सिंह जी लिखतीं हैं, “शशि खरे की कहानियों की मैं पाठक रहीं हूँ और उनकी कहानियों ने मुझे हमेशा प्रभावित किया है। वर्तमान साहित्य के सम्पादन के दौरान 2007 से हमने ‘वर्तमान-साहित्य : कमलेश्वर कहानी-प्रतियोगिता’ का आयोजन किया था। शशि खरे की कहानी इस प्रतियोगिता के लिए हमें प्रतिवर्ष प्राप्त होती थी और हमें उनकी कहानी पसंद आती थी। साठ-सत्तर कहानियों में से शुरुआती स्तर पर हम 15-16 कहानियाँ छाँटते थे, जो दूसरे चक्र में आठ-दस कहानियाँ (कभी-कभी केवल पाँच-छह) निर्णायक मण्डल के सदस्यों चयनित होती थीं और पहले स्थान पर चयनित कहानी को पुरस्कृत किया जाता था। शशि खरे की कहानी हमेशा अंतिम रूप चयनित कहानियों की सूची में होती थी। शशि बिना धैर्य खोए कहानी लिखतीं रहीं, भेजतीं रहीं और प्रशंसित होती रहीं। अंततोगत्वा 2014 के संस्करण में कहानी स्त्री विमर्श (कोसी के घाट पर) के लिए वे पुरस्कृत हुईं”।----- ऐसी ही कुल जमा 21 नायिका-प्रधान कहानियों और एक संस्मरण को मिला कर बना है, यह पठनीय, संग्रहणीय संकलन। पीले फूल कनेर; भले ही शशि खरे का पहला कहानी-संग्रह है- परंतु उनकी अपनी भाषा है ! उनका अपना शिल्प है !! उनका अपना अभिव्यक्ति-कौशल है!!! तथा सबसे बड़ी बात, वे कहानी बुनना जानती हैं।
आज, हिन्दी में इस बात की चर्चा होती है कि कहानियों में किस्सागोई नहीं है। सच भी है; वैश्वीकरण, सूचना-तंत्र, बाजार-वाद की अनु गूँज के साथ साहित्य में समकालीन जटिलताएं बढ़ीं, दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श, स्त्री-स-शक्ति करण, उसके अधिकारों की लड़ाई, अभिव्यक्ति की छटपटाहट, तकनीकी विकास को रेखांकित करतीं कहानियाँ आईं और वह अनादि-परंपरा कहीं हासिए पर चली गई, जिसको समाज ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचित किया था। हमने आधुनिकता, विकास के एवज में उसको गंदा कर दिया है।---- परंतु शशि खरे जी का यह संकलन देखकर परितोष हुआ कि चलो, अभी कोई तो है जो अपने पूर्वजों (माँ-नानी-दादी) की थाती (अंदाजे-ए-बयां) को जिंदा रखे है और उसे परिष्कार कर वर्तमान को सुनाते हुए चाहता है कि “कहानी-विधा पहले जैसी सब की चहेती हो जाए, भले ही कहानी को सौ साल पहले वाले रूप में आना पड़े”।
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सुरेन्द्र सिंह पँवार/ संपादक साहित्य-संस्कार/201, शास्त्री नगर,गढ़ा,जबलपुर-482003। 9300104296/7000388332
