My Sentiments Studio

Bioscope

13June2026

ये

जब एक साधारण से सर्वनाम 'ये' में पूरा संसार सिमट जाए! "आज मेरे ये गाड़ी से गिर गए"—सहेली के इस एक वाक्य ने व्याकरण के नीरस सर्वनाम को पत्नी के गहरे प्रेम, एकाधिकार और भारतीय संस्कृति की मिठास में बदल दिया। शब्दों की गहराई नापती यह कहानी जरूर पढ़ें।

By Shashi Khare2 min read

रंजना गौतम ने घर आने में करने में असमर्थता जताई और लिखा--
" आज मेरे ये गाड़ी से गिर गए  "
दादा !  तो हास्पिटल ले गई थी इसलिए.... क्षमा करें।"
और मैं उनके  ' ये ' के प्रभाव को देखती रह गई।
व्याकरण मुझे पसंद नहीं है।

एम ए फाइनल के ' निबंध ' के पेपर में छह टापिक आये थे उनमें से एक विषय था --  'सर्वनाम ' ।
यदि इस विषय पर निबंध लिखती तो  सर्वनाम की स्थापित परिभाषा, उसकी पहचान, आवश्यकता, 108 प्रकार उदाहरणों सहित और संज्ञा को धकिया कर उसकी गद्दी पर स्वयं को विराजमान करने की उसकी दबंगई की व्यापकता से चर्चा करते हुए अपनी स्मरण शक्ति की विद्वता का परिचय देने पर शायद 70-80 नंबर मिल जाते ;
किन्तु सर्वनाम का  स देखकर ही  मैं आगे सरक गई और घनानंद को चुन लिया था।
व्याकरण की नीरसता से बचने के रास्ते हमेशा ही से खोजती रही, उस पर यह सर्वनाम ! इसके शब्दों में तो लघुता के कारण ध्वन्यात्मकता तक नहीं है।

आज सृजनिका पटल पर रंजना गौतम की यह पँक्ति पढ़ी ' आज  मेरे  ये ' एक साथ दो-दो सर्वनाम ....!
किन्तु मन को ' मेरे ' और 'ये' के  अतुल्य बलशाली चुंबकीय शक्ति ने  खींच लिया।
फुलचुक्की  (पर्पल सनबर्ड )के घोर श्याम बिंदु  जैसे नेत्रों
में  नितल -सी गहराई और गंगोत्री की शीतलता का आभास देते हुए बहुत ही भोले भाव वाला , अपलक सतत प्रतीक्षा जैसा ' ये ' की अर्थव्यंजना का व्यापक विराट विस्तार देखती ही रह गई।

' ये '  सामने आया जब अपने वैभव के साथ  , उसके लाव- लश्कर की आँधी में पुराणों, स्मृतियों, परंपराओं और प्रथाओं के पन्ने फड़फड़ाने लगे।संस्कृति ने गंभीर स्मित के साथ कहा -- 'उनको ' केवल हमारे यहाँ ही  ' ये ' कहा जाता है।जिसके साथ धौलधप्पा खेल सकते हैं, जिससे जीवन से जूझने के लिए जीवनपर्यंत  युद्ध लड़ते हैं उसका नाम नहीं ले सकते।
इसीलिए जब अपने जीवनसाथी से कुछ कहना हो तो नाम संज्ञा के स्थान पर सर्वनाम ' ये'  पदासीन होता है।
बहुतेरे पति भी गरिमा से कहते हैं --घर तो हमारी ' ये '  ही संभालती हैं।

कहने का अंदाज कितना दम रखता है ,यह कभी कभी गहरे विचारों की दुनिया में ले जाता है।
रंजना के वाक्य में " ये" के साथ "मेरे"  ने कितने मोहक रंगों को उभारा है - ' मेरे 'मतलब  प्रेम , अधिकार, चिंता, एकासना,
ये सर्वनाम तो नावक के तीर साबित हुए , काश दिन निबंध ही लिख लिया होता ।