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अबोले बोल

सास माणिक और बहू आशी में बातचीत बंद है। पर दोनों का 'अहम' हर रात रसोई के सिंक में जूठी थाली के ज़रिए एक खामोश जंग लड़ता है! क्या बर्तनों की यह मूक लड़ाई कभी सुलह का रास्ता खोज पाएगी? रिश्तों की कशमकश और अहंकार की इस दिलचस्प कहानी को ज़रूर पढ़ें।

By Neelam Verma4 min read

माणिक और आशी .
सास और बहू .

ठीक वैसी ही जैसी अमूमन होती हैं. एक दूसरे से थोड़ी तनी तनी . 
माणिक का सीधा सा फ़लसफ़ा है - वे बड़ी हैं तो घर में वही होगा जो उन्हें सही लगता है.
आशी का स्वभाव उलझने का नहीं है , उसे रास्ता बदल लेना ज़्यादा सुहाता है .

लेकिन ऐसा बहुत समय तो चलता नहीं, सो नहीं चला.
बहू का सोचना यह की उसने चार ननदों वाले भरे पूरे परिवार के लिए सच्चे मन से खूब किया. 
सास ने माना यह की, ये तो बहू का फ़र्ज़ था और ज़िम्मेदारी भी. पर वे भूल गईं की बेटियाँ तो उनकी जायी थीं तो ज़िम्मेदारी भी उनकी ही थीं.
बेटे बहू की ज़िंदगी में भी सुकून और ख़ुशियाँ हों , ये देखना भी माणिक की ही ज़िम्मेदारी थी. 

अपनी बेटियों को समझाना की, भाई भाभी को भी सम्मान दें और उनका भी ख़याल रखें , माणिक का ही फ़र्ज़ था. लेकिन माणिक का हमेशा कहना यही रहा की बेटियाँ प्यारी होती हैं चाहे वे सही हों या ग़लत.
ज़ाहिर है पक्षपात का उत्पात घर में हमेशा ही रहा . फिर जो होना ही था वही हुआ. सालों साल ग़लत रवैया सहन करती बहू ने ,अपना सम्मान और हक़ आगे बढ़कर ले लिया. नतीजा ? 
सास बहू में अबोला. पूरी तरह.

तो अब बात हर दिन की नहीं , हर रात की है. होता यूँ है कि हर रात माणिक पहले खाना खा कर अपनी जूठी थाली , सिंक में इस  तरह से रख कर आतीं हैं की उसे हटाये बिना दूसरे बर्तन सिंक में रखे ही नहीं जा सकते. 
माणिक का रौब सिंक पर जा पसारता है , हर रात ! 

हर रात आशी की खीझ बड़ती ही जाती है. एक तरफ़ अपनी थाली क्यों नहीं रखीं ये ? क्यों उठाये वह उनकी जूठी थाली ? तो आशी बाक़ी सारे बर्तन प्लेटफार्म पढ़ी रख देती है. माणिक की थाली , पूरे सिंक में अकेली !

शायद शब्द भी इतना साफ़ तौर पर नहीं कह पाते की, दोनों को , एक दूसरे की भावनाओं को ना तो समझना है ना तवज्जो देनी है.

कभी माणिक अपनी झूठी थाली प्लेटफार्म पर रख देती. “ लो अब !“- कहती थी वह थाली.
आग लग जाती आशी को यह देख कर- ” फिर वही, अपने इशारों पर नचाने की कोशिश !”
या फिर ये सबके साथ शामिल होने को कोशिश है ? - कभी आशी ठंडे दिमाग़ से सोचती तो उसे ऐसा भी लगता.


तो क्या करे आशी ? उनकी थाली उठाकर वापस सिंक में पटक दे ? 
“मैं आपके साथ नहीं हूँ “- ऐसा कहना तो है ,पर क्या ये थोड़ा ऊँचा बोलना नहीं हो जाएगा ? 
आशी का स्वभाव ऐसा नहीं है. जब वो अपने स्वभाव के विपरीत जा कर ग़लत व्यवहार करती है तो उसे ख़ुद अंदर से अच्छा महसूस नहीं होता. इसलिए आशी ने सारे बर्तन सिंक में भर दिये और माणिक की थाली फिर अकेली,प्लेटफार्म पर !


परेशान आशी ने अपने पति से सलाह ली.
“अजीब वाक़या है…… अबोला इस ज़बान लड़ता है ?”- पति हैरान !
तो एक बार मिला ही लो ना उनकी थाली सब बर्तनों में , बात ख़त्म करो - उन्होंने सलाह दी.

हमेशा मैं ही तो उनकी अकड़ और ज़िद्द के आगे झुकती हूँ , तकलीफ़ मुझे नहीं होती क्या ? मैं ही नज़रअंदाज़ करती हूँ उनकी तावबाज़ी , ताकि घर का माहौल अच्छा बन रहे. वे क्यों नहीं धमकाना बंद करतीं ? उनके हाव-भाव हमेशा डराने वाले क्यों होते हैं ? लड़कियाँ अपने फ़ायदे के लिए उन्हें भड़कातीं हैं और वे हमेशा सही -ग़लत का हिसाब किए बिना, मुझ पर चिल्लाना शुरू कर देती हैं ? अगर कोई परेशानी है भी, तो अच्छे तरीक़े से भी बात की जा सकती है ना.

आशी की बात ग़लत तो थी नहीं. 
“ तो ना करो फिर .. जब मन ना कहे तो ना करो “- पति ने तथस्त रवैया अपनाया.

फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ. आशी ने देखा , माणिक ने अपनी थाली में से कटोरियाँ और ग्लास निकाल कर बाक़ी बर्तनों के साथ रख दिये थे .ह..म..म….. सुलह ? कटोरियों में परोसी हुई ?

क्या करे आशी ? वे बड़ी हैं , एक कदम ही तो आगे बढ़ा पायेंगी. बाक़ी उनके बड़कपन का मान तो आशी को ही रखना है. रखे या ना रखे ? - आशी से सोचा.
एक बार और झुक कर देखूँ , शायद इस बार रिश्ते सुधारने में वे भी साथ दें ?- आशी ने बहुत सोच-विचार के बाद फ़ैसला लिया.

बड़ी हिचक के साथ आख़िर आशी ने माणिक की थाली बाक़ी सभी बर्तनों में मिला दी. खीज तो वहीं की वहीं  थी , पर लगातार चल रही रार को रोकने के लिए कुछ तो हुआ.

अगले दिन आशी ने देखा, माणिक का चेहरा कुछ कम कटु नज़र आ रहा था. आशी के चेहरे पर आज कटुता की छाया नहीं पड़ी.
सभी के सुकून के लिए यह ज़रूरी था कि सिंक पर बर्तनों का टकराव बंद हो.
तो आज घर में सुख शांति है .

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