मेरी बिटिया
पाँच साल की 'चिरैय्या' के मासूम सवाल कमाल हैं! पर क्या हो जब वह ज़िद करके पापा के दफ़्तर पहुँच जाए और सबके सामने पूछ ले, "पापा, वो सारे जोकर कहाँ हैं जिनके साथ आप काम करते हैं?" पिता की फजीहत और बेटी की मासूमियत से भरी यह मज़ेदार कहानी आपका दिल जीत लेगी!
मेरी बिटिया
नन्ही सी मेरी बिटिया , चिरैय्या !
बड़ी बड़ी शरारत भारी आँखें , चपटी सी नाक और हमेशा मुस्कुराते होंठ .
सुबह सोकर उठती है तो सारे घर में रोशनी फैल जाती है . उसकी आवाज़ की खनक से घर का कोना कोना बज उठता है . है सिर्फ़ पाँच साल की और बातें करती है पुरखन सी. गूढ़ से सवाल करती है - “ ये भगवानजी ने अपना खाना क्यूँ नहीं खाया अब तक ? अगले दिन से हमने प्रसाद खाना शुरू कर दिया !
उसके दूसरे सवालों के जवाब इतने आसान नहीं थे .
“ आसमान ब्लू क्यूँ है , पिंक क्यूँ नहीं ? “
“ मैं कहाँ से आयी हूँ ? “
“ ये डॉग क्या कह रहा है ? “
उफ़्फ़्फ़्फ ...... चिरैय्या और उसके सवाल !
एक दिन चिरैय्या मेरी गोद में बैठी थी , कुछ अनमनी सी . नीचे उतरने को तैयार ही नहीं .
“ पापा को ऑफ़िस जाना है बिटिया “ - मैंने उससे कहा .
“नहीं” - गाल फुलाकर उसने अर्ज़ी ख़ारिज कर दी.
अच्छा , तुम भी चलो ऑफ़िस मेरे साथ - मैंने यूँ ही कह दिया .
चिरैय्या ने सर घुमाया , आँखें मुझ पर टिकायीं और मुस्कुरायी - मैं भी चलूँ ? मैं तैयार हो जाऊँ ?
हाँ हाँ , चलो उठो - मेरा इरादा सिर्फ़ उसे गोद से उतारने का था .
जब मैं ऑफ़िस के लिए तैयार हो कर आया तो चिरैय्या अपना दूध का ग्लास ख़त्म करके , कंधे पर छोटा सा बैग लेकर खड़ी मिली .
“ चलें ?” - उसने उतावली होकर कहा .
बीस मिनट बाद चिरैया और मैं , कार में सवार थे .
जी. उसे समझाने , मनाने की सारी कोशिशें नाकाम हुई थी .
ऑफ़िस में चिरैया अपनी कलरिंग बुक में और मैं अपने कामों में उलझे रहे . चिरैया का सब ध्यान रख रहे थे . उसके पास टॉफ़ी और काग़ज़ के बने खिलौनों का ढेर लग चुका था . चिरैया सब ओर नज़रें घुमा कर , जैसे कुछ ढूँढ रही थी . उसने मुझसे कई बार कुछ पूछने की कोशिश की , पर मैं काम में बहुत उलझा था . हर बार उसके सर पर हाथ फेर कर कहा - बस एक मिनट बिटिया , और उसकी बात नहीं सुन पाया .
अचानक चिरैया का रोना शुरू हुआ . मैं जब तक उसके पास पहुँचता , सारा ऑफ़िस वहां पहुँच चुका था . सब उसे चुप कराने में लगे थे . मुझे देखते ही चिरैया का रोना बंद हुआ और फिर उसकी साफ़ सधी आवाज़ आयी - पापा , वो सारे जोकर कहाँ हैं , जिनके साथ आप काम करते हैं ?
घर में , खीज कर , गाहे-बगाहे यह कहते रहना की मैं तो दफ़्तर में जोकरों के साथ काम करता हूँ , बहुत भारी पड़ा था.
दफ़्तर में इतना गहरा सन्नाटा पहले कभी नहीं सुना था .
मुझे तो काटो तो खून नहीं !
और फिर अचानक एक ठहाका सुनाई पड़ा . उसके साथ ही सारा दफ़्तर खिलखिलाहटों से भर गया.
“मेरा भी ख़्याल कुछ ऐसा ही है ! “ - कोई कह रहा था.
“ और तुम हमारे सरताज हो “ - एक साथी ने मेरे कंधे पर धप्पा मारा.
सो , निराश चिरैया और शर्मिंदा सा मैं , अब घर पर बैठें थे . चिरैया की माँ की हँसीं रोके नहीं रुक रही है .
कुछ देर अपनी गुड़िया से बातें करते करते चिरैया मेरी तरफ़ मुड़ी और मुझसे पूछा -
“ मेरी नाक कहाँ है ? दिखती क्यूँ नहीं है मुझे ?
इससे पहले कि मैं इसका जवाब सोच भी पाता अगला सवाल दागा गया -
“ मेरी आँखें दो क्यूँ है ? दिखती तो एक ही चीज़ है ! “
“ मेरी पूँछ कहाँ है ?
हा हा हा हा ........ दुनिया में सब ठीक ठाक है ! जहाँ इतनी मासूमियत और प्यार बिखरा पड़ा हो , वहां गड़बड़ हो ही क्या सकता है ?
तो अब , चिरैया सो रही है . एक अलौकिक शांति सी है चारों ओर .
नन्ही सी मेरी बिटिया , चिरैया .
