बारिश
आसमान में छाए काले बादल, कागज़ की नावें और बिजली की पाजेब पहने बरसती फुहारें! आषाढ़ के आगमन के साथ प्रकृति को नया जीवन देने वाली बारिश आ गई है। मानसून की अठखेलियों और उसकी खूबसूरती का जश्न मनाती यह मनमोहक रचना आपको भी बारिश की बूंदों से प्यार करने पर मजबूर कर देगी!
बारिश ......स्वागत तुम्हारा !
बारिश ...... इस शब्द में ही बूंदों की छम-छम सुनाई पड़ती है ! आषाढ़ के पहले बादल ने कर ली है बूंदों की अगवानी , अब तो सावन-भादो तक होगी , इनकी ही मनमानी !
हवाओं ने ,पीट –पीट कर बना डाला है काले बादलों का फोया . उनके पीछे छुपा दिए गए सूर्य देव , रूठ गए हैं.
जैसे कोई दे अचानक ही दरवाज़े पर दस्तक , ऐसे ही छत पीटती आई है बारिश ! बिजली की पाजेब पहने , सावन का संगीत सुनाती , अब वह चुप कहाँ रहने वाली है ? ढूँढ रही है वो खिड़की , जो खुली छूट गयी हो . और फिर अन्दर आकर हर चीज़ सीली कर जाएगी . तब देना उसे सजा !
प्रकृति को नव-जीवन देती , हमें भी तो जीवनसिक्त करती है. सोये पड़े नन्हें बीज , बूंदों का दुलार पा , जाग उठे है , बस अब अंगड़ाई लेकर , बाहें फैलाये , बाहर आ निकालेंगे . हमारे अन्नदाता , हमारे किसानों की कितनी कितनी मिन्नतों के बाद आई है ये बूंदे ! अब वे कजली गाते हुए , नए बीज रोपेंगे .
बारिश की इन बूंदों को तो , सबसे ज्यादा पसंद है ये नन्हें बच्चे , जो अपनी माँ की बात अनसुनी कर , बाहर पानी में छपकते , कागज़ की नाव तैराते खिलखिला रहे है. बूंदों को पसंद है इनकी किलकारियां , तभी तो उनके गुलाबी गालों पर गुदगुदी किये जा रही है ! इन नन्हों की शैतानी से सीख ले कर , हवाओं के साथ सांठ गांठ कर ली है इन बूंदों ने . अब, जल्दी-जल्दी घर की ओर भागते लोगों के छाते उलटने वाली है ये ! फिर ठहाके लगाकर हँसेगी , हवायें और ये बूंदे !
कवियों के मन मे आ रहे है सुन्दर ख्याल , जो शब्द बन कर ढल जायेगे , कविताओं में ! जब बारिश हमसे विदा ले लेगी , तब , हम इन कविताओं में ढूंढेंगे, बारिश की बूंदों को ............
पर अभी तो , इन्द्रधनुष का हार पहने , ये हमारा मन मोह रही है ! रात, चाँद को काले बादलों का घूँघट पहना और उतार रही है ! अभी तो बस मन मयूर हुआ जा रहा है ......
बारिश ....... स्वागत तुम्हारा !
बहुत बहुत स्वागत !
