जाड़े की सुबह
घने कोहरे ने कंक्रीट के शहर को ढक लिया है। सातवीं मंज़िल की छोटी सी बालकनी में बैठी एक बूढ़ी दादी, इस कोहरे के खाली पन्ने पर अपने गाँव की खूबसूरत यादें उकेर रही हैं। शहरी अकेलेपन और पुरानी यादों की गर्माहट से बुनी यह भावपूर्ण कविता ज़रूर पढ़ें!
जाड़े की इस सुबह
मिट गयी है पहचान सारी
कुहरे के ख़ाली पन्ने पर
मन ने है कूची थामी
मिटा दी है वह ऊँची बिल्डिंग
बना ली है नीम के पेड़ों की पूरी क़तार
और उस घूरे के बड़े ढेर के बदले
फूलों से लदे हरसिंगार के झाड़
उछलती, चहकती कुछ गौरैयाँ
एक कच्ची पगडंडी और उस पर धूल का ग़ुबार
कोने में बैठी भूरी गाय और उस पर सवार टिटहरी
बूढ़ी दादी, दुखती हड्डियों को भूल
गुन रही है दृश्य मनोहारी
सातवीं मंज़िल की इस डिबिया सी बालकनी में
वैसे भी, धूप कहाँ है आनी!
