पश्चाताप
पहली साँस लेते ही हम ज़िंदगी का असली मक़सद क्यों भूल जाते हैं? यह रचना याद दिलाती है कि जीवन का उद्देश्य खुद के लिए जीना नहीं, बल्कि किसी उदास चेहरे पर मुस्कान लाना और दर्द बाँटना है। जीवन का सच्चा अर्थ समझाती यह मर्मस्पर्शी कविता ज़रूर पढ़ें!
जिस दम हम लेते है पहली साँस
बस, तभी से भूल जाते हैं
मक़सद अपनी ज़िंदगी का
नहीं , किसी का नाम रोशन करना नहीं है
ना दुनिया देख डालना
ना ही दूसरों को समझना
ना खुद को उनकी समझ के दायरे में समेटना
या फिर अपने दिल दिमाग की
हर फ़रमाइश को पूरा करना
क्यों की जीवन मिला है एक बार….
नहीं नहीं , ये सब तो बिल्कुल नहीं है
साफ़ होगा मक़सद अपना
गिनती की साँसें रह जाएँगी जब
याद आएगा किसी का उदास चेहरा
जिसपर आप टाँक सकते थे एक मुस्कान
वो किसी के झुके कंधे
बोझ जिसका आप साझा करते
भूख से रोते मूक चौपाये को
अपशकुन मान धुतकारा था जब
हर वो लम्हा , लेनदार की तरह
अपनी उधारी माँगेगा
जो आपने खुद पर खर्च ली
अब ?
अब तो खुद अपनी साँसें ही
ख़रीदी हुई हैं
सिर्फ पश्चाताप ही कर सकेगा
आपके यहाँ आने का सबब पूरा
वो जो चले जाते हैं हँसते बोलते
सुख सुकून से
उनकी साँसों के साथ ही
ख़त्म होता है मक़सद उनका
