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चित्रगुप्त जी की पूजा

दादी की 'बजरबट्टू' बन जाने की धमकी, कॉपियों पर स्वस्तिक बनाना और चित्रगुप्त जी से अपनी शैतानियों का हिसाब छुपाने की वो मासूम कोशिशें! 40 साल पुरानी यादों में लिपटी चित्रगुप्त पूजा की यह खट्टी-मीठी कहानी आपको भी आपके बचपन की गलियों में ले जाएगी।

By Neelam Verma4 min read

ब्रम्हा जी के चित्त से उपजे ‘ चित्रगुप्त जी ‘ की पूजा का यह दिन कायस्थों के लिए खास होता है .  मेरे लिए यह दिन किसी फ्लैशबैक बटन सा है . मन में पूरी फिल्म सी चल पड़ती है .   चालीस साल पीछे की यादें दस्तक देकर जगाती हैं .   मिट्टी के घर में , ताज़े गोबर से लीपी पूजा की कुठरिया , चूने और गेरू से सजाई हुई. दादी इस दिन की पूजा घर के लड़कों को सौंप कर  , दीपावली की थकान उतारती, दहलान में बैठी बैठी बहुओं और बच्चों को जगाती.   ‘ जे मोड़ा मोडियों खों बजरबट्टू आ बनने आए , तबई सोए डरे सबरे ! - वे चिल्लाती.

दादी की बजरबट्टू रह जाने की खौफनाक बात कानों में पड़ते ही सब बच्चे रजाईयां फेंक उठ खड़े होते .   सोना जिज्जी , यानी नवाईन उबटन लेकर रास्ता ही देख रही होती . ऐसा रगड़ कर मैल निकालती की बच्चों की चमड़ी दो शेड हल्की हो जाती . कितनी भी चालाकी दिखा लो , सोना जिज्जी की पकड़ से बचना मुश्किल ही नहीं , नामुमकिन था. छोटे बच्चों की दिल दहलाने वाली रोने की आवाज़ सुनकर भी उनकी मॉंओं की हिम्मत नहीं थी कि सोना को रोक सकें.   नहाए धोए बच्चे सज धज कर अपनी अपनी कॉपी, पेंसिल को पानी के छीटें देकर शुद्ध करते . चित्रगुप्त जी की तस्वीर के ठीक सामने अपनी कॉपी रखने की होड़ और तिकड़म पूरे ज़ोर पर होती. धीरे से दूसरे की कॉपी परे सरका कर अपनी वाली सही जगह पहुंचाने के फेर में बड़ों की चपत भी खाते .

‘ चित्रगुप्त जी लिख रये तुम औरन के पाप और पुन्न ‘ - दादी की अगली बात सुनते ही हम सबको अपने करम याद आ जाते . रसोई से चुराई मिठाईयां , रोटी के डब्बे से सारी रोटी गाय को खिला आना , दादाजी के पानदान से पिपरमिंट गायब करना …… अपने सारे पाप डराने लगते और हम सब कस के आंखें बंद करे हाथ जोड़े चित्रगुप्त जी को मानते - बस ये वाला पाप ना लिखिएगा !   सबको नए-नकोर कोरे कागज मिलते . उसके नीचे लगाने को कड़े पुट्ठे की भारी कमी होती . सो छीना- झपटी होना और फिर बड़ों से चपत खाना , पूजा पाठ के साथ साथ चलता .

कोरे कागज पर सबसे ऊपर स्वस्तिक बनाया जाता. हल्दी , कंकू से कौन सबसे सुंदर स्वस्तिक बनाएगा , ये अघोषित स्पर्धा चल रही होती . कभी हल्दी ज़मीन पर गिरती कभी कंकू किसी के कपड़ों पर लगता . पूजा के मंत्रों के साथ हल्ला गुल्ला शोर शराबा बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह लगता. किसी बच्चे के स्वस्तिक उल्टा बना देने पर उसके सर पड़ी धौल , बाकी बच्चों कि उधम मस्ती पर भी लगाम लगाती.

फिर लिखना होते थे पांच भगवानों के नाम. शुरू तो सब गणपति जी से ही करते , फिर चित्रगुप्त जी और फिर जिसके मन को जो भाते , उन का नाम आता. किसी के पन्ने पर सरस्वती जी के पहले लक्ष्मी जी का नाम पढ़कर बगल वाला ताना देता - मालूम था , तुमको अक्ल नहीं पैसा प्यारा है !  और फिर कुहनी मार लड़ाई का एक दौर होता. 

इसके बाद कागज पर जमा , खर्च , बचत लिखना होता था . अब भगवान जी को हिसाब दे रहे तो झूठ थोड़े ही लिखते ! सो दिमाग पर जोर डाल डाल कर हलाकान ! दादी ने दस्सी थी दी. ये तो हुआ जमा . पंजी के राजगीर लड्डू खाए . ये हुआ खर्च. बाकी की पंजी क्या हुई ??? खर्च दी , ये तो तय है पर कहां ?

बड़ी शर्मनाक बात थी , एक तो याद नहीं यानी इतनी लापरवाही से खर्च दी और अब बचत के खाने में लिखे क्या ?

इससे उबरते नहीं की एक और फसाद आन पड़ता . अब कागज पर एक वाक्य लिखना होता था . ऐसा वाक्य जिसपर आप अमल करने वाले हो. होशियार बच्चे पहले से सोच रखते थे . बदमाशों को अब होश आता था. कूहनी मार लड़ाई का अगला दौर चलता. जिन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा वे नकल करने की फिराक में होते. जाहिर है ऐसे में अपनी कॉपी को बहुत ऐतिहात से छुपाना पड़ता था. ऐसा महसूस होता था जैसे एग्जाम चल रहे हो. बेतुका वाक्य लिखने वालों का जो मज़ाक बनता था , वो सारी ज़िन्दगी उनका पीछा नहीं छोड़ता था .

पूजा का सबसे अच्छा पार्ट यकीनन प्रसाद खाना होता था, कम से कम हम बच्चों के लिए. मीठे दूध में भीगी अठवाईयॉं , दादाजी खुद अपने हाथों से खिलाते थे. छह फीट के दादाजी की गोद में ३-४ बच्चे तो समा ही जाते थे. जो उनकी गोद में बैठ पता वो दूसरों को विजेता वीर की तरह मुस्कुरा कर देखता.

पूजा के बाद कंकू हल्दी लगी कॉपी दुनिया की सबसे कीमती चीज लगा करती थी. हम कायस्थों में पढ़ाई लिखाई का महत्व हमेशा से ही बहुत रहा है. कच्ची उम्र से ही पड़ने लिखने को गंभीरता से लेने की आदत डालने वाला यह त्यौहार इसलिए खास होता है. आज चाचा बुआ के बच्चों की रेलमपेल नहीं है . पूजा की कोठरी में आरती हवन और गीली मिट्टी से मिलकर जो अद्वितीय खुशबू आती थी , वो नहीं है . दादी की ‘ ढोर डांगर ‘ बनोगे क्या ? , वाली धमकी नहीं है. ना ही दादाजी की गोद है , पर समय का चक्र तीज- त्यौहारों को फिर फिर ले आता है.

कॉपी पेन से नाता जुड़ा रहे . पढ़ लिख कर हम खुद को और दूसरों को बेहतर समझ पाए . अच्छे कर्मों से खाता भरा रहे. शुभकामनाओं के साथ….

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