आज तो ग़ज़ब हुआ !
सोचिए क्या हो जब मोहल्ले की सबसे मशहूर 'मक्खीचूस' पड़ोसन अचानक आपको सपरिवार दावत पर बुला ले? क्या यह कोई चमत्कार था या कंजूसी का नया लेवल? गिन-गिन कर परोसी गई पूड़ियों और पनीले राजमे वाली इस दावत का यह मज़ेदार किस्सा आपको हँसने पर मजबूर कर देगा!
आज तो गजब हुआ !
हमारी पड़ोसन “ श्रीमती मक्खीचूस “ ने हमें खाने का न्योता दिया . सारे मुहल्ले में अपनी मितव्ययिता के लिए कुख्यात , उनके निमंत्रण पर , हमारा तो मुँह खुला का खुला रह गया ! बगैरे पलकें झपकाए उन्हें देख ही रहे थे की उन्होंने बैचैनी से अपनी उँगलियाँ , सोफे पर बजायीं – तो फिर आ रहे है न आप लोग , आज रात खाने पर ?
क्या कोई ख़ास वजह है ? - हमने पक्का करना चाहा की वे सचमुच खाने पर ही बुला रहीं हैं .
ना ना.... बस यूँ ही ! – वे इतराई.
अ... वो ...हम जरा इनसे पूछ लें, ऑफिस में फ़ोन करके . आधे घंटे में बताते हैं.
सोचा, आधे घंटे बाद शायद श्रीमती जी को इल्म हो जाए की वे क्या विकट भूल कर आयीं हैं , और कौन जाने वे अपना इरादा बदल भी दें ?
अच्छा तो फिर मैं इंतज़ार करती हूँ आपके फ़ोन का - कहकर जैसे ही वे टली ,हमने दफ्तर फ़ोन लगाया .
“ देखो ऑफिस में मजाक का वक्त नहीं है “- कहकर पतिदेव ने फ़ोन पटक दिया . हम सोच ही रहे थे की पतिदेव का उवाच , किस तरह श्रीमती मक्खीचूस को बतायें , की उन्हीं का फ़ोन आ गया.
आ रहे है न आप सब ? देखिये मना ना कीजियेगा, आ ही जाइए .
मनुहार ?? श्रीमतीजी मानुहार कर रहीं थीं ? दुनिया में चमत्कारों का अंत नहीं प्रभुजी ! हमने पिघलते हुआ कहा – आप को कैसे ना कह सकते है ? हम दोनों जरुर आयेंगे .
अपने दोनों बच्चों को भी ले कर आयें - श्रीमतीजी ने कहा.
हमने जल्दी से कहा – नहीं नहीं , आपको परेशानी होगी .
अरे परेशानी कैसी ? तो मिलते है रात को.
रात को पतिदेव और बच्चों को किस तरह मनाया , ये एक अलग किस्सा है , फिर कभी सुनियेगा. तो हम सब मन में शक और हाथ मे तोहफा लिए उनके दरवाजे जा पहुँचे .
आइये ..आईये - वे चहकीं.
काफी देर यहाँ वहाँ की बातों के बाद जब पति और बच्चे अपनी अपनी जगहों पर कसमसाने लगे , तो हमने श्रीमतीजी को इशारा किया – “ क्या किचन में मैं आपकी कुछ मदद करूँ ?”
नहीं नहीं , सब तैयार है , हमारे साथ आये भतीजे को घूरती हुई वे बोली - ये भी यहीं खाएँगे ?
भतीजा कोई परीक्षा देने अचानक ही आ गया था , सो हम उसे भी साथ ले आये थे.
पतिदेव का चेहरा तमतमा कर लाल हो गया. वे बोले – “ नहीं , आपके यहाँ से लौटकर हम इन्हें होटल में कुछ खिलाने ले जाएँगे !”
अरे, अब आ ही गए हैं तो दो पूड़ी यहीं खा लेंगे - श्रीमतीजी ने दरियादिली दिखाई.
तो मूढ़मती , पूछा ही क्यों ?- हमने मन ही मन कुढ़ कर सोचा.
बड़ी नज़ाकत से खाना परोसा गया , हर एक थाली मे दो दो पूड़ियाँ , सूखे आलू की सब्जी और पनीले राजमे.
टेबल पर अचार और पापड़ रखती हुई वे बोलीं – जरुरत हो तो लीजियेगा !
अब ऐसी ताकीद के बाद भला किसे जरुरत होती ?
सलाद काटें क्या ?- उन्होंने पूछा . कई लोग बाहर का, बिना पका नहीं खाते.
क्यों क्या आप भी बिना धोये सलाद काटती हैं ? - मुँह से निकलते निकलते रह गया.
एक पूड़ी और प्रदान करने के बाद वे किचन से बाहर आयीं और झरिया हिलाते हुए बोलीं – और पूड़ी कौन कौन लेगा , बता दें , नहीं तो बेकार ही सिंकी पड़ी रहेंगी. कड़ाके की भूख के बाबजूद , हम सब बोल पड़े – “ बस बस , पेट भर गया है”
वे पल्लू में हाथ पोंछती बाहर आईं और बोलीं – बहुत ही कम खाते है आप लोग तो . खाना तो तबियत से खाना चाहिए !
खिलाना भी तो तबियत से चाहिए ना ! – हमारे सुपुत्र उसी तर्ज़ में बोल पड़े . हमने उसकी ओर आँखें तरेर कर देखा.
अब मनाओ की कल महरी आ जाये, नहीं तो इतनी थालियाँ धोने को हो रहेंगी – वे माथे से पसीना पोंछती हुई बोली , जैसे बारात को जिमाया हो.
हम सब का तो भूख से हाल बुरा था , सो हमने इज़ाज़त मांगी .
अभी तो खीर बाकी है – उन्होंने हमें देखकर ऐसे कहा जैसे न जाने कौन सा शाही पकवान परोसने वाली हों. आप लोगों के पेट भरे हैं , थोड़ी देर में देती हूँ .
जब भूख से मर जाये , तब मुँह में डाल देना दो दो चम्मच , गंगाजल की जगह ! - बेटी हमारे कान में भुनभुनाई .
अब जब तक खीर न आ जाये , तब तक जाना भी ठीक न था. दावत की वज़ह अब तक मालूम न हो पाई थी , सो हमने पूछना शुरू किया.
“आज किसी का जन्मदिन है क्या ?”
नहीं जी – उनके श्रीमान मुस्कुराये.
तो फिर आपकी शादी की सालगिरह ?
अरे नहीं नहीं ! – वे हँसे.
तब आज कोई अच्छी खबर मिली है ! – हमने लम्बा तुक्का मारा .
“ ऊँहुक ! “.... – श्रीमती जी रहस्मयी तरीके से मुसकुरायीं. दरअसल बात यह है की , आज हमारे ममेरे भाई अपने परिवार सहित खाने पर आने वाले थे. सुबह उन्होंने फ़ोन करके बताया की वे नहीं आ पाएँगे . अब आप ही बताइए , राजमे हम रात ही भिगो चुके, खीर भी रात ही बना ली थी. आज उठते ही आटा सान लिया था , आलू उबाल लिया. अब बचा ही क्या था करने को ? उसके बाद भले लोग कहते हैं , नहीं आ रहे ! आप ही कहिये ?
अब कहने सुनने को बचा ही क्या था ? जो खा लिया था वही बाहर आने लग पड़ा था , खीर तो अन्दर क्या ही जाती .
पतिदेव ने तत्काल प्रभाव से अपना स्थान त्यागा , खाने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया और तीर की तरह निकल लिए.
“अरे खीर नहीं खाएँगे आप लोग ? “ – हम सब को खड़ा देख कर वे हैरान हुई .
फिर इसके पहले की हम कुछ कहते , वे बोलीं –
चलिए , कोई नहीं , खीर तो हम लोग चार छः दिन में ख़तम कर ही लेंगे , बाकी तो सब निपटा !
हम सब की हालत ये थी न हँसते बन रहा था न रोते !
घर आकर खिचड़ी बनायी, छह सौ की साड़ी जो हम उन्हें दे आये थे , उसका दुःख मनाया और कल मुहल्ले में किसी को कुछ न बताने की कसम एक दूसरे को खिला कर सो रहे ..
