कितना मज़ा है बस सोचते रहने में
नन्हे अवि ने काम से बचने का एक अनोखा तरीका ढूँढ लिया है - हर काम से पहले "मैं सोच रहा हूँ!" कहना। लेकिन क्या होगा जब एक दिन अवि की माँ उसे खाना देने से पहले और पापा उसे घुमाने ले जाने से पहले बस 'सोचने' बैठ जाएं? आलसी अवि को सबक सिखाती यह मज़ेदार कहानी ज़रूर पढ़ें!
अवि एक छोटा बच्चा है , अपने पापा, माँ, दादा और दादी का लाड़ला . अवि इतना छोटा भी नहीं है की अपने काम खुद ना कर सके . लेकिन यही बात उसे बिलकुल पसंद नहीं है . सोकर उठते ही ब्रश करो और फिर उसके बाद तो काम पीछा ही नहीं छोड़ते . नहा लो , तैयार हो जाओ , स्कूल जाओ ........ ऐसा क्यूँ नहीं हो जाता की जब जो दिल चाहे वही करो या मन ना हो तो कुछ ना करो -वह सोचता .
सोचना.....यही वो काम था जो अवि सबसे ज़्यादा करता था. हमेशा किसी कोने बैठा , अपनी सोच में मगन अवि ! घर के लोगों का ख़याल था की ये आलसीपन की निशानी है , काम से बचने का शानदार तरीक़ा . लेकिन अवि को ऐसा बिलकुल नहीं लगता है .
“दादी ही तो कहती है की हर काम सोच -समझ कर करना चाहिए . इसलिए में सोचता रहता हूँ. “- अवि का कहना है.
सुबह का वक्त है , हर कोई काम में व्यस्त है. पापा शेव रहे है , माँ नाश्ता बना रही है , दादाजी सैर को गए है और दादी बाल-गोपाल भगवान को नहला रही है. और अपना अवि ? वो बिस्तर के कोने पर बैठा सोच रहा है . माँ ने कमरे में झाँक कर देखा और चिल्लायीं - अवि , नहाया नहीं अब तक ?
“सोच रहा हूँ माँ ! “ - अवि बोला .
अरे क्या ? - माँ की हैरान परेशान आवाज़ आयी.
कल ही तो नहाया था , अब फिर नहाऊँ की नहीं ?
थोड़ी देर बाद अवि किसी तरह नहा कर स्कूल के लिए तैयार हुआ और फिर अपने स्कूल बैग को घूरता हुआ पाया गया .
अवि बाहर निकलो , स्कूल बस आती होगी - माँ ने फिर कमरे में झाँका.
मैंने अपनी गणित की कॉपी बैग में रख ली या नहीं , यही सोच रहा हूँ - अवि ने कहा .
“ अरे तो बैग खोल कर जल्दी देख लो ना ! “- माँ झल्लायीं.
एक मिनट तो रुको , अभी याद आ जाएगा मुझे ! - अवि अभी भी ध्यानमग्न बैठा था .
तभी स्कूल बस की आवाज़ आयी और अवि लपकता हुआ बाहर भागा , नाश्ता किए बग़ैर ही बस में बैठ गया.
अक्सर ऐसा ही होता था .
स्कूल से लौटकर फिर वही क़िस्सा .....
“ अवि , स्कूल यूनीफ़ॉर्म नहीं बदली अब तक ? “
माँ, इसे तो धुलना ही है ना अब ? तो .....
“तो तुम सोच रहे हो सीधे रात को ही चेंज करोगे ? “ - माँ ने सर पकड़ लिया .
जाने क्या दिक़्क़त है ? इतना तो सोच समझ कर काम करता हूँ .....फिर भी माँ नाराज़ ! - अवि ने सर खुजाया .
आज शाम को घर पर मेहमान आने वाले है - पापा ने कहा . एक भी ख़िलौना बाहर नहीं पड़ा मिलना चाहिए .
पर मेहमानों के बच्चों के साथ खेलने को खिलौने फिर बाहर निकालने पड़ेंगे ना ? तो सोचो इन्हें अंदर रखने का क्या फ़ायदा ? ज़रा नहीं सोचते ये बड़े लोग - अवि बड़बड़ाया .
दादी के पास बैठकर हर रोज़ वही लड़ईयै की कहानी सुनो . क्यूँ भला ? सोचते ही नहीं ये लोग ! याद हो गयी है वो कहानी मुझे अब तो . पर माँ कहती हैं , दादी को अच्छा लगता है अवि को पास बैठा कर कहानी सुनाना.
कल दादाजी को गर्म हलवा देने गया था , वो फ़ोन पर बात कर रहे थे सो अवि हलवे सहित अपने कमरे में आ गया . अब हलवे का लालच आख़िर कितनी देर रोका जा सकता था ? तो हलवा अवि खा गया . बाद में जब माँ को पता चला की हलवा दादाजी को मिला ही नहीं , तो उन्होंने अवि को डाँटा - मुझसे फिर माँग कर दादाजी को दे आते !
मैंने सोचा , अब तो खाने का ही वक्त हो गया है , वो हलवा खाएँगे की खाना ? - अवि ने कहा.
तुम इतना सोचते क्यूँ हो आख़िर ? - माँ बहुत नाराज़ हुईं
तंग आ गया था अवि घर के लोगों से और लोग अवि से .
“ठीक है “ - अब से हम सब भी सोच कर काम करेंगे- माँ ने कहा.
अगले दिन स्कूल से लौटा तो टेबल पर खाना नदारद !
माँsssssss- भूख लगी है , अवि ने आवाज़ दी .
“ मैं सोच रही हूँ “ - माँ का जवाब आया . की पराँठा आलू का बनाऊँ या सब्ज़ियों वाला ?
अरे !!!! पर मुझे तो भूख लगी है
पहले सोचने तो दो ज़रा - माँ बिलकुल अवि की तरह आराम से बैठी थीं.
इसके बाद तो सोचने का सिलसिला ही चल पड़ा .
शाम को घुमाने ले कर जाने के लिए पापा “सोच” रहे थे . ले जाऊँ या नहीं , बाहर धूल बहुत है .
दादी के पास गया तो वो भी सोच ही रही थीं की अवि को कहानी सुनाएँ या बाल-गोपाल जी की आरती ही कर डालें ?
दादाजी ने कहा कि लूडो खेलने का मन तो है पर आज न्यूज़ पेपर नहीं पढ़ पाए हैं .
सोच लूँ थोड़ा , की क्या करूँ ?
ये क्या बात हुई ?- अवि ने कहा .
हाँ ये तो कोई बात नहीं हुई - पापा ने अपनी हँसी रोकते हुए कहा .
क्यों रे , क्या कह रहा था तू ? - मैंने कहा है हर काम सोच समझ कर करने को ? तो रोज़ रोज़ के कामों को भी सोचने को कहा है क्या ? अरे जब कोई नया काम या बड़ा काम हो तब थोड़ा सोच समझ लिया कर .
अवि ने सबको देखा और सबने उसे . फिर सब खिलखिला कर हँस पड़े.
इतना ना सोचा कर बेटा की समय पर काम ना हो - पापा ने कहा .
घड़ी पर नज़र रखो और आलसीपन छोड़ दो - दादाजी ने कहा
जी - अवि ने कहा और सरपट अपने कमरे में भाग लिया
