उलट बबुआ
नटखट बबुआ हर बात का उल्टा ही करता है! 'दूध पी लो' कहो तो मना कर देता है। उसकी ज़िद से परेशान माँ ने एक गज़ब की तरकीब निकाली- उन्होंने ही बातें उल्टी कहनी शुरू कर दीं! "बबुआ, स्कूल मत जाना!" क्या माँ की इस 'रिवर्स साइकोलॉजी' से उल्ट बबुआ सुधरेगा? मज़ेदार कहानी पढ़ें!
बबुआ एक छोटा सा बच्चा है , वैसा ही जैसे सब छोटे बच्चे होते हैं . हर समय उधम , मस्ती में मगन !
कभी सड़क पर भरे पानी में छपक रहा , कभी कुत्ते के छोटे छोटे पिल्लों की दुम खींच रहा . घर भर के तकियों को एक जगह इकट्ठा कर के, उनकी झोपड़ी बना कर, उसमें छुप के ,चॉकलेट खा रहा !
बबुआ दिखने में तो प्यारा है ही, लेकिन उससे भी ज़्यादा प्यारा है उसका दिल। वह बहुत ही खुशमिजाज़, हँसमुख और मस्तमौला बच्चा है वह ! मुहल्ले के सब लोग उसे पसंद करते हैं क्योंकि वह हर किसी को हँसा देता है -कभी अपनी अजीब शरारतों से, तो कभी अपनी मज़ेदार बातों से.
बबुआ को घर के बाहर रहना ज़्यादा पसंद है , इतनी सारी चीजें जो देखने मिलती है वहाँ .
पहले हवा चलती है या पहले पेड़ हिलते है ,और तब हवा चलती है ? - वह सोचता.
सूरज शाम को कहाँ छुप जाता है ?
“जब पेड़ों को छींक आती है , तब हवा चलती है .
“सूरज का महल है , बादलों का बना हुआ , वो वहीं जा कर सो जाता है” - बबुआ की दादी उसे जवाब देती रहतीं.
बबुआ में बस एक ही बात ख़राब है ,वह मनमर्ज़ी से चलने वाला बच्चा है . बबुआ को किसी की भी बात मान लेने में बहुत परेशानी होती है. उसकी इसी एक आदत ने सबको परेशान कर रखा है . उसे जो भी कहा जाए ,वो उसका ठीक उल्टा करता है .
मम्मी कहतीं, “बबुआ, दूध पी लो,” तो वह कहता, मुझे पराठे खाना है .पापा कहते, “बेटा, स्कूल का होमवर्क कर लो,” तो वह खेलकूद में लग जाता.दादी कहतीं, “छाता लेकर जाओ, बारिश आएगी,” तो वह बिना छाते के निकल पड़ता और भीगकर लौटता.
अगर मम्मी कहें, ये अच्छे कपड़े पहन लो , बाहर जाने वाले हैं हम , तो वह नाईट ड्रेस पहन लेता.जब घर में सब लोग चुपचाप बैठना चाहें, तभी वह ज़ोर-ज़ोर गाने और नाचने लगता.रात को सोने का समय हो, तो वह कूद-कूदकर खेलने लगता, और सुबह उठाने पर कहता, “मुझे अभी सोना है!”
सब उसे प्यार करते थे, लेकिन उसकी उल्टी-पुल्टी आदत से तंग आ गए थे। सबसे ज़्यादा परेशान थीं उसकी मम्मी, जो हर रोज़ उसे समझा-समझा कर थक चुकी थीं . एक दिन मम्मी को एक तरकीब सूझी. उन्होंने सोचा, “अगर बबुआ हमेशा उल्टा ही करता है, तो मैं उसे बात सीधे तरीक़े कहूँ ही क्यूँ ?
अगले दिन सुबह-सुबह मम्मी ने कहा, “बबुआ बेटा, आज स्कूल मत जाओ , घर पर ही रहो और बस आराम करो.”
बबुआ चौंक गया, “ मम्मी खुद कह रही हैं कि स्कूल मत जाओ ? इसका मतलब तो मुझे जाना चाहिये !!”
और वो खुशी-खुशी स्कूल चला गया।
फिर शाम को मम्मी ने कहा, “आज पढ़ाई बिलकुल मत करना, टीवी देखो और खेलो.”
टीवी देखो और खेलो ?? बबुआ ने सुना और तुरंत वह किताब खोलकर पढ़ने लगा.
अब मम्मी ने हर बात उल्टी बोलनी शुरू कर दी.
“दूध मत पीना बबुआ, बहुत खराब है. ”“हाँ मम्मी !” - और बबुआ पूरा गिलास दूध पी गया.
“फ्रिज से चॉकलेट निकाल लो और सब खा जाओ! “नहीं, अब तो नहीं खाऊँगा!” बबुआ बोला।
धीरे-धीरे मम्मी की इस तरकीब ने असर दिखाना शुरू कर दिया। बबुआ हर काम ठीक करने लगा, क्योंकि मम्मी हर सही बात को उल्टा ही बोल रही थीं .
थोड़े दिन बाद स्कूल में ‘साफ़-सफाई सप्ताह’ शुरू हुआ . मास्टर जी ने कहा, “बच्चों, अपने घर से धूल पोंछने का कपड़ा के कर आना है , और अपने अपने डेस्क ख़ुद ही साफ़ करने है ”
बबुआ ने सुना और मन में सोचा, “अगर मास्टर जी कह रहे हैं कि लाओ, तो मैं तो नहीं लाऊँगा!” और अगले दिन वह खाली हाथ स्कूल चला गया।
सब बच्चों को कहा गया की अपनी अपनी डेस्क को पोंछें . बबुआ तो पोंछने वाला कपड़ा लाया ही नहीं था. टीचर ने उसे एक कपड़ा दिया और कहा की इससे अपनी डेस्क साफ़ करो. बबुआ उस कपड़े को बॉल बनाकर खेलने लगा.
सब बच्चे हँसने लगे. बबुआ को लगा उसने बहुत मज़ेदार हरकत की है , तभी सब हँस रहे हैं. लेकिन उसने देखा टीचर उसे अजीब तरह से देख रहे थे और मुँह बग़ल में करके मुस्कुरा रहे थे.
क्यों घर में भी ऐसा ही करते हो क्या ? - उन्होंने पूछा. तुम्हें किसी ने सिखाया नहीं की बड़ों की बात समझ कर वैसा ही करना चाहिये जैसा कहा जा रहा है . अगर कोई परेशानी है तो बताना चाहिए .
क्या तुम्हें कपड़े से अपनी डेस्क साफ़ करने में कोई दिक़्क़त है ? क्या तुम साफ़ सफ़ाई करना सीखना नहीं चाहते ?
बबुआ उदास हो गया और घर आकर अपनी मम्मी से बोला, “मम्मी, मैं हमेशा उल्टा क्यों करता हूँ ? आज स्कूल में सब मुझ पर हँस रहे थे. मम्मी ने मुस्कुराकर उसे गले लगाया और कहा, “क्योंकि तुम स्पेशल हो, लेकिन अब जब तुम समझदार हो रहे हो, तो सही और गलत पहचान सकते हो।”
बबुला थोड़ी देर सोचता रहा और बोला, “अब से मैं सिर्फ वही करूंगा जो सही हो, चाहे वो किसी ने कहा हो या नहीं!”
उस दिन के बाद बबुआ बदल गया। अब वह मम्मी की बात मानता था .
बिना सोचे समझे मनमानी करना तो ठीक नहीं है , उससे लोग मुझे बेवकूफ समझ सकते हैं . मनमर्ज़ी करने से बहुत से काम गलत भी हो जाते हैं- बबूला को समझ आया .
मुहल्ले के लोग हैरान थे—“अरे ये तो वही उल्ट बबुआ है ना ? ये तो अब समझदार हो गया है. बबुआ को अपने लिए “ समझदार” सुनना बहुत अच्छा लगा.
मम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा, “कभी-कभी बच्चों को उनकी ही भाषा में समझाना पड़ता है.”
और इस तरह उल्ट बबुआ, बन गया समझदार और प्यारा बच्चा.
कभी-कभी ज़िद्दी व्यवहार को समझदारी और प्यार से बदला जा सकता है.
