लकड़हारे की कुल्हाड़ी
जब एक गरीब लकड़हारे की लोहे की कुल्हाड़ी कुएँ में गिरी, तो जल देवता सोने और चाँदी की कुल्हाड़ियाँ लेकर बाहर आए! क्या लकड़हारे का ईमान इस लालच के आगे डगमगाएगा या उसकी सच्चाई उसे कोई बड़ा ईनाम दिलाएगी? पढ़ें ईमानदारी की यह दिलचस्प कहानी!
एक छोटे से गाँव में , एक गरीब लकड़हारा रहता था . लकड़हारा समझते हो ? लकड़हारा मतलब जो जंगल से पेड़ों की सूखी लकड़ियाँ काटता है. और सूखी लकड़ियों का क्या करते हैं ? पुराने समय में आज की तरह गैस या बिजली से खाना नहीं पकता था . मिट्टी के चूल्हे पर सूखी लकड़ियाँ जला कर खाना पकता था. आज भी गाँवों में बहुत से घरों में ऐसा ही होता है .
तो , वो गरीब लकड़हारा हर रोज़ जंगल जा कर सूखी लकड़ियाँ काटता और उन्हें बेच कर अपना घर चलाता था. बहुत पैसा तो नहीं थे उसके पास , पर वो बहुत खुश रहता था .
सुबह जल्दी उठता, भगवान के भजन गाता , अपने बच्चों के साथ खेलता , गाय को चारा डालता , जंगल से लकड़ी काट कर बेचता , घर आकर अपने माता- पिता और पत्नी के साथ गरमा गर्म खाना खाता और सो जाता . खूब गहरी और अच्छी नींद आती थी उसे , क्योंकि वो दिनभर बहुत मेहनत करता था . इतनी मेहनत करने से उसका शरीर बहुत मज़बूत और निरोगी था.
एक दिन की बात है ,लकड़ी काटते हुए , लकड़हारे की कुल्हाड़ी कुएँ में गिर गई . कुल्हाड़ी समझते हो ? कुल्हाड़ी याने लोहे की तेज धार वाला सर जो लंबी सी, मोटी लकड़ी पर लगा होता है . कुल्हाड़ी से लकड़ियाँ काटी जाती हैं .
लकड़हारे ने कुएँ में झाँक कर देखा . उसमें तो बहुत पानी भरा था और कुल्हाड़ी कुएँ में नीचे जा कर बैठ गई थी. किसी भी तरीक़े से कुल्हाड़ी निकाल के लाना लकड़हारे के बस की बात थी ही नहीं.
बिना कुल्हाड़ी के तो लकड़हारे की रोज़ी रोटी चलना मुश्किल था . लकड़हारे ने ज़ोर ज़ोर से रोना शुरू कर दिया . आस पास से लोग भागे भागे आये . सबने बहुत कोशिश की लकड़हारे की कुल्हाड़ी कुएँ से निकालने की , लेकिन कुआँ गहरा था और उसने पानी भी बहुत ज़्यादा भरा था . सारे लोग हिम्मत हार कर चले गये .
लकड़हारे ने रोते रोते अपने भगवान जी को याद किया . हे भगवान ,मैं तो सिर्फ़ आपको ही जानता हूँ , आपके भजन गाता हूँ , मेरी मदद करें . कुल्हाड़ी के बिना तो मैं लकड़ियाँ नहीं काट सकता . फिर मैं बेचूँगा क्या और परिवार के लिया आटा, चावल , दाल कैसे ख़रीदूँगा ? मेरी मदद करें …..मेरी मदद करें !!
भगवानजी ने लकड़हारे का विलाप सुना , वे बहुत दुखी हो गये . रोज़ तो ये लकड़हारा ख़ुशी ख़ुशी मेरे भजन गाता था , आज ये रो रहा है . भगवान जी ने तुरंत जल के देवता वरुण जी को कहा की कुएँ के तल में पड़ी कुल्हाड़ी निकाल कर उसे वापस कर दें .
वरुण देवता ने भगवान जी से पूछा की आख़िर इस लकड़हारे में ऐसी क्या बात है जो आप इसकी मदद के लिए दौड़े चले आये ? भगवान जी ने मुस्कुरा कर कहा की ये बहुत संतोषी और मेहनती है , सारा दिन काम करते करते मेरा नाम जपना नहीं भूलता .
वरुण देवता ने कहा की मैं इसकी कुल्हाड़ी अभी निकाल कर देता हूँ। लेकिन पहले मैं इसकी परीक्षा लूँगा. भगवान जी ने कहा - ज़रूर लो.
लकड़हारा अभी भी कुएँ का पास बैठा रो रहा था जब कुएँ से वरुण देवता बाहर आये . उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखा और बोले - रोओ मत . देखो में तुम्हारी कुल्हाड़ी ले आया .
लकड़हारा वरुण देवता को देख कर हैरान रह गया . उसने जल्दी से अपने आँसू पोंछे और उन्हें उन्हें प्रणाम किया . फिर उसने उनके हाथ में कुल्हाड़ी देखी .
ये तो चाँदी की कुल्हाड़ी है - उसने हैरानी से कहा . लेकिन ये मेरी कुल्हाड़ी नहीं है देव.
तो क्या हुआ , तुम ये ले लो - वरुण देव ने कहा .
नहीं,नहीं ये मेरी नहीं है , में इसे नहीं ले सकता . आप मुझे मेरी कुल्हाड़ी ला दें , नहीं तो मैं बहुत मुसीबत में पड़ जाऊँगा .
ठीक है , मैं फिर से कोशिश करता हूँ तुम्हारी कुल्हाड़ी ढूँढने की - ऐसा कहकर वरुण देव फिर कुएँ में उतर गये. थोड़ी देर बाद वे वापस आए तो उनके हाथ में एक और कुल्हाड़ी थी . उस कुल्हाड़ी को देखकर , लकड़हारे की आँखें खुली की खुली राह गयीं .
ये तो सोने की कुल्हाड़ी है - उसने कहा .
हाँ , तुम ये ले लो - वरुण देव ने उससे कहा.
लकड़हारे ने सर हिलाते हुए कहा की ये भी मेरी कुल्हाड़ी नहीं है , मैं इसे भी नहीं ले सकता .
हे देव , आप मुझ गरीब से ऐसे खेल ना खेलें , मुझे मेरी कुल्हाड़ी ला दें - लकड़हारे के आँसू फिर बहने लगे.
अच्छा भाई , रोओ नहीं . बाक़ी बार तुम्हारी ही कुल्हाड़ी लेकर आता हूँ - वरुणदेव ने कहा और फिर से कुएँ में उतर गये .
थोड़ी देर बाद वे वापस आए तो उनके हाथ मैं लकड़हारे की लकड़ी और लोहे की कुल्हाड़ी थी .
हाँ हाँ , यही है , यही है मेरी कुल्हाड़ी !!!! - लकड़हारे ने ख़ुशी से उछलते हुए कहा . आपका बहुत बहुत आभार हे देव , आपने मेरी बड़ी मदद की है . मैं आपके गुण हमेशा गाऊँगा . लकड़हारे ने उनके पैर छूते हुए कहा .
और मेरे ???? लकड़हारे ने सर उठा कर देखा तो भगवान जी स्वयं मुस्कुराते हुए खड़े थे . लकड़हारा तो बस हाथ जोड़ कर , आँखों से बहते आँसू लेकर खड़ा का खड़ा रह गया .
भगवान जी ने हँस कर उसे गले लगा लिया और कहा - मेरे तो गुण तुम हमेशा ही गाते हो !
फिर भगवान जी ने वरुण देव से पूछा - तो मेरा भक्त तुम्हारी परीक्षा में खरा उतरा की नहीं ?
परीक्षा ? - लकड़हारे ने पूछा .
हाँ , वरुण देव तुम्हारी ईमानदारी की परीक्षा ले रहे थे - भगवान जी ने कहा . तुमने चाँदी और सोने की कुल्हाड़ियों को लेने से मनाकर दिया .
वो तो मेरी थी ही नहीं प्रभु - लकड़हारे ने हाथ जोड़ कर कहा .
हाँ नहीं थीं , पर अब हैं - भगवान जी ने मुस्कुरा कर कहा . उन्होंने वरुण देव के हाथों से सोने और चाँदी की कुल्हाड़ियाँ ले कर लकड़हारे को दे दी . यह तुम्हारी ईमानदारी और भक्ति का फल है .
लकड़हारा ख़ुशी के मारे उनके पैरों पर गिर पड़ा और उन्हें बार बार धन्यवाद कहा.
और फिर तीनों कुल्हाड़ियों को लेकर ख़ुशी ख़ुशी अपने घर की ओर चल पड़ा.
