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कुत नई

"क्या कर रहे हो तुम ?" "कुत नई !" बस !! यही वो शब्द हैं जिनसे मां बहुत घबराती हैं। अवि के सवालों से भी ज्यादा उसकी चुप्पी से, घर भर के लोग डरते हैं। (यह अंश तुरंत यह सस्पेंस बनाता है कि आखिर एक चार साल के मासूम बच्चे की 'चुप्पी' पूरे घर के लिए इतनी खौफनाक क्यों है!)

By Neelam Verma8 min read

सर्दियों के दिन हैं और दोपहर का समय . नन्हें अवि के घर में सभी, आंगन में गुनगुनी धूप में ऊँध रहे हैं . लेकिन अवि सोने के मूड में है ही नहीं . कुल- जमा चार साल और कुछ महीनों के अवि को हर समय कुछ ना कुछ पूछना होता है . अगर किचेन में हो तो गैस सिलेंडर पर हाथ पटक कर पूछेगा - ये आग इस टंकी में भली है क्या ? पापा के पास हो, तो कहेगा - ये आंखों पर ढक्कन क्यों लगाए ? और जो चश्मा उसे लगा दिया जाए तो और सवाल ! मुझे दिखाई देना क्यों बंद हो गया ? मां ने उसे अपनी गोद में सुलाने की कोशिश की , लेकिन दिमाग में जो सौ सवाल अभी भी थे उनके जवाब पाए बिना नींद आए कैसे ? दादी उसे समझा रही हैं कि थोड़ी देर सो जाने से वो बहुत जल्दी लंबा हो जाएगा और मजबूत भी . “ तो क्या पापा और भी लंबे हो होएंगें ? - अवि ने रजाई ओढ़ कर सोते पापा को देखा और हैरानी से अपनी आंखें झपकीं . उफ्फ ! - दादी ने अपनी रजाई सर के ऊपर खींची और सो गईं. अब अवि हीरामन तोते से बतिया रहा - लाल लाल मिर्ची खा लहे हो ? कों ?? अभी लोने वाले हो तुम . आखिर मॉं को भी नींद का झोंका आ ही गया. जब उनकी नींद खुली तो उन्होंने सबसे पहले अवि की टोह ली . कहीं से कोई आवाज़ नहीं ! मॉं एक झटके से उठ बैठीं . “ अवि !!!!!! “ - उन्होंने आवाज़ लगाई . “ अवि . अवि !!! तीसरी आवाज़ के बाद उन्हें जवाब मिला - हाँ मॉं ? क्या कर रहे हो तुम ? “ कुत नई ! “ बस !! यही वो शब्द हैं जिनसे मां बहुत घबराती हैं . वे तेज़ी से लपकती हुईं अवि के पास पहुंचीं. किचेन के फर्श पर अंडे फूटे पड़े थे . सारे के सारे ! ये क्या ???? - मां चिल्लाईं . आपने कहा था कि ……. क्या कहा था मैंने ????? …..की मुर्गी अंडे से आती है . है ही नहीं इनमें मुर्गी - अवि ने बहुत निराशा से कहा. मां ने अपना सर पकड़ लिया . बस इसीलिए , अवि के सवालों से भी ज्यादा उसकी चुप्पी से, घर भर के लोग डरते हैं मां और दादी ने मिलकर एक बार ढेर सारी गुझिया भरी. सारे कमरे में गुझिए फैले रखे थे . थोड़ी देर में मां उन्हें तलने वाली थीं. ज़रा सी देर को वे कमर सीधी करने को लेटी थी. बस इतनी ही देर अवि की आवाज़ें आना बंद हुई होंगी. और जैसे ही मां को यह समझ आया उन्होंने आवाज़ दी - अवि क्या कर रहे हो ? “ कुत नई !” - अवि ने बहुत जल्दी से जवाब दिया . वे दौड़ती हुई गुझियों को देखने आयीं . तब तक तो तबाही मच चुकी थीं !! अवि कमरे में फैली , हर फूली - फूली गुझिया पर कूद कर जा चुका था. मां और दादी ने मिलकर अवि के कान खींच डाले , पर नुकसान तो हो चुका था . ऐसा नहीं है कि अवि की चुप्पी का कहर सिर्फ मां और दादी पर ही गिरता हो . दादाजी पर तो और भी कठिन गुजरी थीं. एक बार उन्होंने अवि को दोपहर में अपने पास सुला लिया. “देखो मेरे पास ये कितनी अच्छी तरह रहेगा “- दादाजी ने शान से कहा . जाने कितनी कहानियां सुनी और कितने ही सवालों के जवाब मिले अवि को ….और फिर वो गहरी नींद सो गया. दादाजी भी एक विजयी मुस्कान के साथ सो गए . कुछ देर बाद जब उन्हें अपने सीने पर भारीपन महसूस हुआ तो उनकी आंख खुली. देखा तो नन्हा अवि उनपर सवार था और उसका चेहरा एकदम ध्यान में डूबा लग रहा था. “अवि , क्या कर रहे हो ? “- उनिंदे से दादाजी ने पूछा . “ कुत नई ……” - अवि ने एकदम इत्मीनान से जवाब दिया. अवि की “ कुत-नई “ सुनते ही दादाजी के होश उड़ गए . एक झटके से उन्होंने अवि को अपने ऊपर से उठाकर बगल में रखा और उठ खड़े हुए . दो मोटे मोटे पेन उनके ऊपर से फिसल कर नीचे गिरे . दादाजी ने उन्हें उठाकर देखा - परमानेंट - मार्कर्स !!!!!!! क्या किया इससे अवि ? - दादाजी चिल्लाए . “कुत-नई” - अवि का जवाब आया. दादाजी , अवि को उसकी मां के पास छोड़ने कमरे से बाहर आए . मां ने दादाजी को देखा और अपने पल्लू में मुंह छिपाकर अपनी हँसी रोकी. लेकिन दादी ने तो हंसी रोकने की कोई कोशिश ही नहीं की . वे खिलखिला कर हँस पड़ीं . दादाजी की कुछ समझ नहीं आया . उन्होंने अवि को देखा . वो तो अभी भी इत्मीनान से ही खड़ा था. आईना देखो - दादी ने हँसी रोकते हुए कहा. जो दादाजी ने आईना देखा तो उनकी खुद ही हँसी निकल पड़ी .अवि ने उनके चेहरे पर जगह जगह बिंदियां बना दी थीं . ये क्या किया तुमने ? - दादाजी को याद आ गया कि बिंदियां परमानेंट मार्कर्स से बनाई गई हैं . अवि ने मां के पीछे छिपते हुए कहा - “ कुत-नई ! “ ना जाने कितनी देर दादाजी अपना चेहरा साबुन से रगड़ते रहे और अगले दो दिन तो घर से निकले भी नहीं . कभी कभी अवि की चुप्पी की साथी , बगल में रहने वाली नन्ही पियू भी होती है. पियू वैसे भी चुप रहने वाली बच्ची है . बोलती कम और मुस्कुराती ज्यादा है. अवि और पियू की मांओं को बातें करते हुए कुछ देर हुई होगी , जब दोनों को एक-साथ, बच्चों की याद आई . वे अपनी चाय और पकोड़े छोड़ कर भागीं और जो देखा तो उनके मुंह खुले के खुले रह गए . दोनों बच्चे नाई की दुकान लगाए बैठे थे . अवि के हाथ में कैंची थी और पियू एकदम चुप बैठी अपने बाल कटवा रही थी. ऐसी नायाब हेयर- स्टाइल तो किसी सैलून का नौव्वा भी नहीं बना सकता था. एक बार फिर नुकसान तो हो ही गया था. इस बाल खड़े कर देने वाली घटना के बाद , घर के बड़े लोगो ने सोचा की अवि को एक कुत्ता ला कर दिया जाए , जिससे वो उसके साथ खेलने में मगन रहे और गड़बड़ियाँ ना करे . तो इस तरह झबरू घर लाया गया . लंबे , झबरे बालों वाले झबरू में अवि का मन , सच में पूरी तरह लग गया. अवि की चुप्पियां और बढ़ गई , लेकिन अब उसकी कारस्तानियां झबरू तक ही सिमटी रहती हैं . एक दफा रबर बैंड का पूरा पैकेट झबरू की चोटियां बनाने में खर्चा गया. झबरू के सर से लेकर दुम तक ढेरों चोटियां बनाई गई. पूरा डायनोसोर नजर आ रहा था झबरू ! रात को मॉं को झबरू पर लगी रबर बैंड्स हटाने में बहुत वक्त लगा ,पर सुकून था कि किसी तरह का नुकसान तो नहीं हुआ . मां की नेल पॉलिश झबरू के बीस नाखूनों में लगी मिली . उतनी देर की अवि भी चुप्पी भी किसी को भारी नहीं पड़ी . लेकिन झबरू और अवि की यारी तब खटकी जब वो दोनों एक ही कटोरे में खाना खाते पाए गए . अवि sssss - मां ने चीख कर उसे झबरू के पास से खींच कर अलग किया और बहुत गुस्से से पूछा - क्या कर रहे हो तुम ????? “ कुत भी तो नई !!!!!” - अवि ने भी बहुत परेशान हो कर जवाब दिया . इसके कुछ ही दिनों बाद अवि की बुआ उनके घर आयीं . उन्होंने अपने सूटकेस से जरूरी सामान निकाला . नन्हा अवि ध्यान से देखता रहा और फिर उसने पूछा - मैं कर दूं ?? बुआ बातों में लगीं थीं , ना जाने उन्होंने किस बात पर सर हिलाया और अवि ने उसे “हां” समझ लिया. घंटे भर बाद जब बड़ों की गप्पें खत्म हुईं और बुआ वापस कमरे में आयीं तो गजब का नजारा दिखा . उनके सूटकेस का हर एक सामान पूरे कमरे में बिखरा पड़ा था ….. इससे पहले कि अवि से कुछ कहा जाता उसने हाथ खड़े किए और बोल पड़ा - कुत्त नई !!!! जब अवि के “कुत नई “ किस्से बुआ ने सुने तो वे हँसते हँसते बेहाल हो गईं . अरे बड़ा ही मजेदार बच्चा है ये तो ! - उन्होंने कहा . खाक मजेदार !!! - मां बड़बड़ाई. कम से कम टीवी , मोबाइल से तो नहीं चिपका रहता - खुशदिल बुआ मुस्कुराईं . अगले दिन जब अवि सोकर उठा और दूध पीने आया तो उसे डायनिंग टेबल से एक तरफ बड़ा सा गत्ता , रैंप की तरह लगा दिखा . ये क्या ??? - अवि ने तुरंत पूछा. कुत नई ! - बुआ ने अवि को छेड़ा. चलो अपनी सब कारें लेकर आओ . अब बुआ और अवि मगन हैं , रैंप पर ऊपर से कारें छोड़ रहे हैं और उन्हें तेज़ी से सामने दौड़ते हुए देख देख खुश हो रहे हैं . थोड़ी देर बाद अवि पूरी तरह इस खेल में डूब गया और बुआ आराम से अपना स्वेटर बुन रही . ये तो बहुत अच्छा रहा - मां ने शांति की सांस लेकर कहा. हां , लेकिन ये हर समय काम नहीं करेगा . इस बच्चे के लिए कुछ ना कुछ नया और मजेदार काम ढूंढ कर रखना होगा - बुआ ने कहा. ये बहुत कल्पनाशील और जिज्ञासु बच्चा है , जो बहुत ही अच्छी बात है. कहीं हम इसके ये गुण खत्म ना कर दें . बस हर थोड़े समय में हमें एक ऐसा काम इसे देना होगा जो इसके तेज दिमाग और हाथों को काम पर लगाए रखे . अगले दिन , बुआ और अवि , सभी खिलौनों को धो कर चमका रहे थे . कुछ दिनों बाद दोनों ने मिलकर फूलों के बीज लगाए . अब अवि उन्हें हर रोज पानी देता है और नन्हें पौधों को देख कर खुश होता है. चलो हम इन सूखे हुए कपड़ों की तह लगाएं - बुआ कहती. और अवि उनके साथ कपड़ों को गोल गोल घुमा कर रखता जाता . शाबाश ! - बुआ उसकी पीठ थपथपा कर कहती - मेरा बच्चा ! कितना काम करता है . और अवि का चेहरा खिल उठता. पापा के मोजों की सही जोड़ी बना कर रखना , अवि का एक और पसंदीदा काम बन गया है . बुआ तो वापस चली गई, पर अब घर के बाकी लोगों को तरकीबें आ गई हैं अवि को मगन रखने की. अब अवि की “कुत्त नई !” , बहुत कम सुनाई पड़ती है और कान खिंचाई तो बिल्कुल नहीं होती. आज अवि और दादाजी , आंगन में पिकनिक कर रहे हैं . मां की साड़ी तार पर डाल कर तंबू बनाया है और उसके अंदर आराम से बैठने और खाने पीने की चीजें जमा की है. ज़ाहिर है दादाजी सिर्फ बैठे रहे और अवि दौड़ दौड़ कर सब सामान लाता रहा . अवि ने मन भर कर हलवा पूरी खा ली है और अब वो बस सोने ही वाला है. तो नन्हें अवि के साथ अब सब कुछ ठीक ठाक है. सर्दियों की दोपहर है और सब , अवि के साथ ऊंघ रहे हैं ।

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