खास आम
जब एक राजा ने मित्र को धोखा देकर आम की गुठलियां खराब कर दीं, तो शुरू हुआ रसीले आमों को कड़वा करने का एक अनोखा बदला! राजा कृष्णदेव के चतुर माली ने कैसे पड़ोसी राज्य के आमों को नीम सा कड़वा कर दिया? दोस्ती, धोखे और चतुराई की इस दिलचस्प कहानी को ज़रूर पढ़ें!
दक्षिण भारत के एक छोटे से राज्य के राजा थे कृष्णदेव . बहुत न्यायप्रिय , दयालु और अपनी प्रजा को खुश रखने वाले . उन्हें स्वयं विभिन्न कलाओं का ज्ञान था और वे सभी कलाकारों का बहुत सम्मान करते थे. उन्हें बाग-बगीचों , पेड़ पौधों का विशेष-शौक़ था और जीव जंतुओं से भी लगाव था . उनके राज्य में शिकार खेलने की मनाही थी. राजमहल में और सारे राज्य में बहुत से हरे भरे बगीचे और जंगल थे जहां सभी पशु पक्षी पनाह पाते थे . राजा के बगीचों में बहुत ही सुंदर फूलों के असंख्य पेड़ पौधे थे . ज़ाहिर सी बात थी की पेड़ पौधों की जानकारी रखने वाले लोगों की काफ़ी पूछ परख थी राजा कृष्णदेव के राज्य में. बागों में काम करने वाले मालियों की पूरी फ़ौज थी. जो भी माली कुछ अनोखा कर दिखाता , उसे राजा कृष्णदेव बहुत से इनाम देते थे . राजा कृष्णदेव के पड़ोसी राज्य से भी अच्छे संबंध थे . वहाँ के राजा वीरभद्र से कृष्णदेव की गहरी दोस्ती थी. राजा वीरभद्र को कृष्णदेव के प्रकृति-प्रेमी होने की बात पता थी और वे समय समय पर अपने बाग से नए तरह के फूलों और फलों के पौधे भिजवाते रहते थे. बदले में राजा कृष्णदेव के माली, राजा वीरभद्र के बगीचे को बेहतर बनाने के लिए भेजे जाते थे . चाहे गृह-नक्षत्रों और दिशाओं के अनुरूप पेड़ लगाकर खास तरह का बगीचा तैयार करना हो या पूजा -पाठ के लिए देवी देवताओं के प्रिय पुष्प लगाने हो , राजा कृष्णदेव के माली सभी में पारंगत थे. एक बार की बात है , गर्मियों का समय था . राजा वीरभद्र की ओर से एक संदूक, तोहफ़े में राजा कृष्णदेव को भेजा गया. जब उसे खोला गया तो एक मनभावन ख़ुशबू सब ओर फैल गयी . उसमें पीले-सुनहले ,मोटे रसीले फल रखे थे. “इन्हें आम कहते हैं . किसी सुदूर प्रदेश से एक यात्री इन्हें लाया था और इनके बीज़ हमारे राज्य में लगा गया था. अब तीन साल बाद उनमें फल आए हैं , जो आपके लिए हमारे महाराज ने भिजवाए हैं .” - साथ में आए माली ने कहा. जब राजा कृष्णदेव ने उस फल को खाया तो वे उसके दीवाने हो गए ! क्या रंग , क्या ख़ुशबू और क्या बेहतरीन स्वाद !! ऐसा तो कोई फल आज तक ना उन्होंने देखा था ना सुना था . उन्होंने राजा वीरभद्र को कोटि कोटि धन्यवाद भेजा . अब राजा कृष्णदेव के सबसे खास माली को यह काम सौंपा गया की आम की गुठली बोयी जाए . बहुत ही सावधानी से गुठलियों को रोपा गया . माली को ताकीद दी गयी की पौधे निकलते ही राजा कृष्णदेव को बताया जाए . कुछ दिनों के इंतेज़ार के बाद जब पौधे नहीं निकले तो सभी मालियों ने मिलकर तरकीबें आज़मायीं और फिर इंतेज़ार किया . लेकिन पौधों को नहीं निकलना था सो नहीं निकले . सभी माली बहुत परेशान हुए और राजा के आगे शर्मिंदा भी . फिर उन्होंने ज़मीन से गुठलियाँ वापस निकालीं और ध्यान से उसका मुआयना किया . तब उन्हें पता चला की गुठलियों की आँखें , यानी जहां से आम का पौधा निकलता वो तो पहले ही फोड़ दी गयी थीं. किसी नुकीली चीज से आम की गुठलियों को छेद दिया गया था ताकि उसमें से पौधा उग ही ना पाए. राजा कृष्णदेव को जब ये बात पता चली तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ की उनका मित्र ऐसा भी कर सकता है. लेकिन सच्चाई तो यही थी . आम का फल आम ना हो जाए , खास ही रहे , शायद इसी लिए ये हरकत की गयी थी . राजा कृष्णदेव को यह बात इतनी बुरी लगी की उन्होंने इसका जवाब राजा वीरभद्र को देने का मन बना लिया. उधर राजा वीरभद्र , उनकी इस बात से अनजान थे. समय अपनी चाल चलता रहा और आम वाली बात आयी-गयी हो गयी . या राजा वीरभद्र को ही ऐसा लगा था ? एक दिन राजा वीरभद्र का ध्यान अपने बगीचे पर गया . कुछ बदला बदला और बेहतर लग रहा था. फूलों की लताओं को विभिन्न तरह के आकार दिए गए थे , कुछ मोर तो कुछ हाथी के आकार में ढाली गयी थीं. जगह जगह पानी के सुंदर कुंड बनाए गए थे जिनमें पक्षी कलरव कर रहे थे. बगीचे का एक हिस्सा ख़ुशबूदार पेड़ों से संवारा गया था , जो मन पर जादुई असर कर रहा था. राजा वीरभद्र प्रफुल्लित हो गए . उन्होंने पूछा कि बगीचे का ऐसा कायाकल्प आख़िर हुआ कैसे ? “ महाराज किसी अन्य प्रदेश से एक आदमी भटकता हुआ यहाँ आया था, वो बहुत गरीब और जरूरतमंद लग रहा था . मैंने उसे काम पर रख लिया था. उसका नाम श्याम है .ये उसी की करामात है.” - प्रधान माली ने राजा को बताया . राजा वीरभद्र ने श्याम से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की जिसने बगीचे को इतना सुंदर बना दिया था . श्याम ने उन्हें बताया कि वो एक दक्ष माली है और राजा कृष्णदेव के बगीचे में काम पाना चाहता है . लेकिन बहुत कोशिशों के बाद भी उसे वहाँ प्रधान माली से मिलने नहीं मिला . “ मैंने सुना है आप राजा कृष्णदेव के परम मित्र है . अगर आप मेरे काम से खुश हैं और मेरी सिफ़ारिश कर दें तो मुझे वहाँ काम मिल सकता है . वे अपने काम में पारंगत माली को बहुत मान देते हैं , इसलिए मैं वहाँ नौकरी पाना चाहता हूँ “ - श्याम ने हाथ जोड़ कर विनती की . तुम मेरे ही बगीचे में काम करो , तुम्हारी अपेक्षाओं से बढ़कर तुम्हें तनख़्वाह और इनाम मिलेंगे - राजा वीरभद्र ने कहा . श्याम ख़ुशी ख़ुशी उनके यहाँ काम करने लगा . थोड़ी ही समय में उसने राजसी बगीचे को इतना सुंदर बना दिया की राजा वीरभद्र उसके प्रशंसक हो गए और उसे प्रधान माली का पद दे दिया . श्याम को अब बगीचे के उस हिस्से में जाने मिलने लगा जहां आम के पेड़ लगे थे. आम के पेड़ों की देखभाल का ज़िम्मा भी उसे मिला. श्याम जी-जान लगाकर उन पेड़ों की देखभाल करता . कुछ समय में पेड़ों में बौर आए और नन्हें नन्हें आम निकल आए. उन आमों की गिनती की गयी और पेड़ों के पास सख़्त पहरा लगा दिया गया . बड़े इंतज़ार के बाद आम पक कर पीले-सुनहले हुए . एक खास दिन तय करके आम के फलों की पहली फसल तोड़ी गयी और राजा वीरभद्र बड़े ही शौक़ से आम खाने बैठे . जैसे ही उन्होंने आम की एक फाँक अपने मुँह में डाली , उनका चेहरा उसकी कड़वाहट से बिगड़ गया . “ कितना कड़वा आम ! इसकी मिठास को क्या हुआ ? “- वे परेशान होकर बोले ! तुरंत दूसरा आम काटा गया और उन्हें पेश किया गया , लेकिन ये भी उतना ही कड़वा था . एक एक करके सारे आम चखे गए और सभी बेहद कड़वे थे. “ प्रधान माली श्याम को बुलाया जाए “- राजा ने बहुत नाराज़गी से कहा. अब श्याम कहीं होता तो मिलता ! वह तो कब का राजा वीरभद्र का राज्य छोड़कर जा चुका था . और इस समय वह राजा कृष्णदेव के सामने खड़ा था . “मैंने अपना काम कर दिया महाराज . सारे आम इतने कड़वे होंगे की उन्हें कोई नहीं खा पाएगा ! “ - दमकते हुए चेहरे के साथ उसने कहा . “ बहुत ख़ूब !! , तुम्हें इसका वाजिब इनाम दिया जाएगा .” - राजा कृष्णदेव ने कहा . पर ये तो बताओ तुमने ऐसा किया कैसे ? बहुत ही आसान था महाराज - श्याम ने कहा . मैंने हर रोज़ आम के पेड़ों को,बारीक पिसी नीम की पत्तियों और करेलों के घोल से सींचा . फल मीठे हो ही नहीं सकते थे . कुछ दिनों बाद राजा वीरभद्र , राजा कृष्णदेव से मिलने आए. राजा कृष्णदेव ने मुस्कुरा कर कहा - “ मित्र , क्या इस बार सारे आम खुद ही खा जाओगे . हमारे लिए थोड़े भी नहीं लाए ?” राजा वीरभद्र का बहुत ही मायूस जवाब आया -“ मित्र , इस बार तो आम की पूरी फसल ही ख़राब हो गयी है , ना जाने अब कभी आम मीठे आएँगे भी या नहीं ? “ “ ज़रूर आएँगे ! “ - राजा कृष्णदेव ने मुस्कुराते हुए पूरे विश्वास के साथ कहा. आप इतने भरोसे के साथ कैसे कह सकते है ? - राजा वीरभद्र ने हैरानी से पूछा . “ क्यूँकि , ऐसा हमारे प्रधान माली श्याम ने बताया है . श्याम ??? वो आपका माली है ? - राजा वीरभद्र ने चौंक कर कहा . जी - राजा कृष्णदेव ने कहा. आपके आम की फसल बर्बाद करने के लिए हम बहुत क्षमा माँगते हैं. लेकिन आपने आम की गुठलियों के साथ जो चालाकी दिखायी थी वो हमें नागवार गुज़री थी. अपनी नाराज़गी दिखाने के लिए ही हमने श्याम को आपके यहाँ भेजा था . लेकिन आप चिंता ना करें , आम के पेड़ों को शक्कर के पानी से सींचें ,अगले साल फल मीठे ही आएँगे . राजा वीरभद्र अपनी करनी पर शर्मिंदा हुए और उन्होंने अपनी गलती के लिए खेद व्यक्त किया . दोनों दोस्त गले मिले और शिकायत को भुला दिया. राजा वीरभद्र ने राजा कृष्णदेव को आम के पौधे भेजने का वादा किया और राजा कृष्णदेव ने वादा किया , अपने सबसे बेहतरीन माली श्याम को समय समय पर राजा वीरभद्र के बगीचे में भेजने का , ताकि उनका बगीचा भी संवरा रहे.
